हिन्दी जैन साहित्य परिशीलन | Hindi Jain Sahitya Parishilan
श्रेणी : हिंदू - Hinduism

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
9 MB
कुल पष्ठ :
254
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)दाशनिक जाधार २५
प्रादुमाव हो जानेपर आत्मा स्वोन्सुखरूपसे अवृत्त करती है, जिससे राग-
द्ेषके सरकार शियिल और श्रीण होने ভ্যান ই বখা হলসবনঈ परिपूर्ण
होनेपर आत्मा परसात्मा अवस्थाको प्राप्त हो जाती है। अतः आत्म-शोधनमे
सम्यक् श्रद्धा और सम्बग्शानके साथ सदाचारका महत्त्वपूर्ण स्थान है |
जैन-सदाचार अहिसा, सत्य, अचोर्य, अल्मचर्य और अपरिग्रह रूप है।
इन पॉचो तर्तो्में अहिसाका विशेष स्थान है, अवशेष चारो अहिंसाके विभिन्न
रूप हैं| कपाय और प्रमाद--असावधानीसे किसी जीवको कष्ट पुँचाना
या प्राणघात करना हिसा है, इस हिंसाको न करना अहिंसा है। मूलतः
हिंसाके दो भेद हैं--द्रव्यहिंस और भावहिंसा। किसीको मारने या
सतानेके भाव होना भावहिंसा और किसीकों मारना या सताना द्वव्यहिसा
है। भावोके कछुपित होनेपर प्राणघातके अभावमें भी हिंसा-दोप छगता है |
अहिंसाकी सीमा शहस्थ और मुनि--साधुकी दृष्टिसे मिन्न-मिन्न है ।
गहस्थकी हिंसा चार प्रकारकी होती है--संकव्पी, आरम्भी, उद्योगी और
विरोधी | बिना अपराधके जान-बूझकर किसी जीवका वध करना सकलपी
हिंसा है। इसका दूसरा नाम आक्रमणात्मक हिसा भी है | प्रत्येक गहस्थ-
को इस हिसाका त्याग करना आवश्यक है। सावधानी रखते हुए भी
भोजन वनाने, जल भरे, कूटने-पीसने आदि आरम्भ-जनित का्येमि
होनेवाली हिंसा आरम्मी; जीवन-निर्वाइके लिए खेती, व्यापार, शिल्प आदि
का्यमिं होनेवाली हिसा उन्ोगी एवं अपनी या प्रकी रभाके लिए होने-
वाली हिंसा विरोधी कही जाती है| ये तीनों प्रकारकी हिंसाएँ रक्षणात्मक
है। इनका भी यथाशक्ति त्याग करना साधकके लिए आवश्यक है।
ध्वय जियो और अन्यको जीने दो” इस सिद्धान्त वाक्यका सदा पालन
करना सुख-शान्तिका कारण है। राग, द्वेष, शणा, मोह, ईर््या आदि
विकार हिंसामे परिगणित है।
जैनधर्मके प्रवर्तकोने विचारोकी अहिंसक बनानेके लिए स्थाह्मद-विचार
समन्वयका निरूपण करिया है । यहं सिद्धात आपसी मतभेदं अथवा पश्षपात-
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