ब्रज के वैष्णव संप्रदाय और हिंदी साहित्य | Braj Ke Vaishnav Sampradaya Aur Hindi Sahitya

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Braj Ke Vaishnav Sampradaya Aur Hindi Sahitya by हरिमोहन दास टंडन - Harimohan Das Tandon

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथम प्रकरण वैष्णव धर्म का संक्षिप्त इतिहास और कृष्णोपासना वैष्णव धर्मं कौ प्राचीनता ओर विकास विष्णु, नारायण ओर वासुदेव प्राचीन आर्य सूर्य कौ जीवन प्रदायिनी ओर उपयोगी चैतन्य शक्ति से बहुत प्रभावित हुए थे । त्रैकालिक संध्या, गायत्री, उषास्तुति, नित्य नैमित्तिक कर्म आदि सभी सूर्य से संबंधित आर्य प्रिय कार्य थे । सूर्य का काल्पनिक स्वरूप विष्णु के प्रतीक के रूप में सामने आद्या। त्रिविक्रम विष्णु, त्रैकालिक संध्या के आधारभूत सूर्य के व्यंजक हैँ । उनका महत्व धीरे-धीरे बढता गया ओर वे यन्न के मूल, परम धाम के अधिकारी ओर इन्द्र, अग्नि, वरुण, रुद्र आदि से अधिक महान्‌ हो गये । यास्क के पूर्वं ही वे शरीरधारी समञ्ञे जाने लगे थे ओर उनकी त्रिविक्रम संज्ञा ऐतिहासिक समझी जाने लगी थी ।१ नारायण की सर्वप्रथम चर्चा शतपथ ब्राह्मण में आई है, किन्तु वहाँ विष्णु के साथ उनका कोई संबंध नहीं प्रतीत होता। वामन पुराण में नर और नारायण की कथा उन्हें एक ऋषि ही व्यक्त करती है। तैत्तरीय आरण्यक काल में नारायण स्पष्ट परमात्मा और सृष्टि विषयक भावना के केन्द्र बन गये थे। उनका विष्णु के साथ संघटन हो चुका था, किन्तु वेदिक साहित्य मे ओर उसके बाद भी उनमें कोई भी मध्य युग के उपास्यके रूप मेँ स्वीकृत न हुए थे। दयालु भगवान कौ भावना का प्रादुर्भाव सात्वत्‌ या भागवत धर्म के प्रचार होने पर ही हुआ। सात्वत्‌ धर्म के उपास्य वासुदेव थे। तैत्तरीय आरण्यक के अंतिम भाग में वासुदेव का नाम आया है । वे पांचवीं शताब्दी ई०पू मे निश्चित रूप से पूजा के आधार ओर उपास्य बन गये थे । पाणिनि ने अपने व्याकरण के एक सूत्र मे वासुदेवक शब्द सिद्ध किया है जिसका अर्थ विद्वानों ने एक स्वर से पूजार्ह ' किया है ।२ अत: उसके काफी पूर्व ही उनकी पूजा प्रचलित हो गई होगी। चौथी शताब्दी ई०पू० में मेगास्थनीज ने शौरसेनियों के द्वारा हैराक्लीज कृष्ण की उपासना का वर्णन किंया है, कर्टिस के ९. वैष्णव वर्शिप एण्ड बुद्धिज्म, श्री केऽपी० जायसवाल, इंडियन एंटीक्यूरी, खंड ४७, पृ० ८४ २. श्री हेमचन्द्रराय चौधरी ने पाणिनि का समय वीं शताब्दी ई०पू० सिद्ध किया है। मे०स्ट०वै०से, पृ० १४-१६




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