सुवेला | Suvela

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Suvela by शम्भुनाथ 'शेष'- Shambhunath 'Shesh'

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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तभी खुलेंगे द्वार / अभी रुद्ध हैं द्वार ! अभी नहीं वह ज्योति नयन में जो पहचाने रूप, हृदय-भूमि को अभी चाहिए नव जागृति की धूप / जिसके स्पर्शमात्र से सरसं मानवता के प्राण, जिनका सरत-यरत कर प्रतिमा वने, मूके पाषाण ! स्वप्न का हो श्व॑गार ! किन्तु अभी तमसाइत है नम अभी रुद्ध हैं द्वीर ! अभी रुद्ध हें द्वार ! अभी नयन में केलि कर रहे योवन मद के सपने ! मन की दुर्बलता, आशंका आतुर भय से अपने, अविश्वास की कंथा ओढ़े मानव अब तक सोता वह क्या जाने खर-उपा का दर्शन कैसा होता !




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