षटखंडागम | Shatkhandagam
श्रेणी : साहित्य / Literature

[adinserter block="2"]
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
70 MB
कुल पष्ठ :
640
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)शका समाधान ` ( ५)क्रिया गया है, ओर साती पृथिवीति सम्यक्व सहित निर्गमन द्वोना संभव ही नहीं है । दृष
्षयोपशम सम्यक्व तभी प्राप्त क्रिया जा सकता है जब सम्यक्त्व प्रकृतिका सथा उदेढन नदीं
हो पराया, ओर उसकी सत्ता रेप है । अतएव क्षयोपशम सम्यक्त्वके स्वीकार करनेमे उत्कृष्ट
अन्तर् पल्योपमका अक्तट्यातवां भागमात्र काल ही प्राप्त हो सकता है । किन्तु ভনহাল सम्यक्त्व
तभी प्राप्त हा सकता दे जत्र सम्यक्व व स 9, पग्रकृतियोंकी उद्देलना पूरी हे। चुकती
दे । अतएव उपशम सम्यक्व प्राप्त करानेते ही उक्त कुछ अन्तभुद्तोको छोड रोष
আপনা उच्कृष्ट अन्तर प्राप्त हो सकता है; क्षयोपशम सम्यक्त्व प्राप्त करानेसे
नहीं है। सकता ।पुस्तक ५, पृ, ३८१३, शंका--संत्र नें, 9० की टीकामे तीन पंचेन्द्रिय तियंच मिथ्याइश्योंका
जघन्य अन्तर् बतरति हए उन्दं केवट एक असयतसम्यक्ल गुणस्थानमे ही क्यो प्राप्त कराया
सूत्र न. ३६ की टीकाके समान यहां मी € अन्य गुणस्थानमें छेजाकर ” ऐसा सामान्य निर्देश
बर तृतावय, चतुथ व पचम गुणस्थानका प्राप्त क्या नहां कराया ? ( नेमीचंद रतनचंदजी, सहारनपुर )समाधान- सूत्र न. ३६ ओर ४० की टीकाम केवर कथनहैटीका हयी भद ज्ञात
होता है, अथका नहीं। | यहां सम्यक्लपे समवतः केवट चतुथं गुणस्थानका ही अभिप्राय नह, किन्तु
मिथ्यालक्नी छोड उन सब गुणस्थानेसि है जो प्रकत जीवोके समव हैं | यह बात काछानुगमक्े
सृत्र ५८ की टीका (पुस्तक 9 प्र. ३६३ ) का देखनेसे और भी स्पष्ट हो जाती है. जहां
उक्त तीनों तिबचोके मिथ्यालसे सम्यम्मिथ्यात्व, अस्ंयतसम्यक्तत्र व संयतासंयत गुणस्थानम जाने-
अनिका स्पष्ट विधान है |पुस्तक ५, १, ४०পু१४७, शंका--सूत्र 9५ में तीन पंचेन्द्रिय तियँच सम 'इष्टियोंका उत्कृष्ट अन्तर
प्रतछात हुए अन्तमें प्रथम सम्यक्वकों ग्रहण कराकर सम्यम्मिथ्यात्वको क्यों प्राप्त कराया,. सीधे
मेथ्यात्वस ही सम्यग्मिथ्यात्वको क्यें नहीं प्राप्त कराया ? क्या उनके सम्यक्त्व और सम्यग्मिश्यात्व
पकृृतियोंक्री उद्देलना हो जाती है £ ( नेमीचंद रतनचंदजी, सहारनपुर )समाधान- हा, वहां उक्त दो प्रकृतियोंकी इदरेखना ह्यो जाती दै | वह उद्देलना
स्योपभके असंस्यात्वै भागमानन कालम ही हा जाती दै, ओर यां तीन पस्योप्म काठक
अन्तर् बतलाया जा रहा है ।
User Reviews
No Reviews | Add Yours...