दंश के दायरे | Dansh Ke Dayare

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Dansh Ke Dayare by मंजु गुप्ता - Manju Gupta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कुछ नही के फूल सतजुग फौ बाति दै । एकया ढेला गौर एक वा पत्ता । दोनो मे वदी दोस्ती थी, सत्ता और भद सी। पानी आता तो पत्ता ढेने को टक लेता कि कही घुल न जाये। आधी जाती तो ढेला पत्ते पर बैठ जाता कि कही उड न जाये । एक दिन दानोमेहो गई लडाई कि कौन छोटा, कौन वडा 1 तव तक आधौ पानी साथ- साथ आ गये। आधी ने उडा लिया पत्ता और पानी ने धृलादिया উলা। লীনী उडते रह--घुलते रहे उडते रह--घुलते रह। लेक्नि लडत सतयुग भर रह कि कौन छोटा, कौन बडा | द्वेता मे एक बना सेवा, एक बना सत्ता । एक दित दोनो से हो गयी लडाइ कि कौन छोटा, कौन बडा । दोनो हो गये गुत्यमग्ुत्या, तो इस कदर घुल मिल गय कि पहचाने ही न मिलें। लगे, कि सत्ता हो गई है संवा और सेवा हा गयी है सत्ता, दोनो ঈবা খত লব रहे--लडते रहे. द्वापर मे एक বলা राजा, एक बना प्रजा। एक दिन दोना से हो गयी लडाई कि क्रौम छोटा कौन बडा । दोनो ने वेश यदल सिये । एक वन ममा दिग, हरा बन गया रात-- और भागे एक दूसरे के पीछे । कभी दिन आग, कभी रात आगे । इसी तरह भागते रहे- भागते रहे द्वापर भर । कलयुग मे एक बना असली एक वना नकली 1 एक दिन दिना म हौ गयी लडाई कि कोन छोटा, कौन बडा ! असली ने वहा, “मैं बड़ा हूँ, क्योकि में असली हूँ ।! नकली नही माना 1 बोना, “अपने को तो सभो असली कहते हैं, लक्नि असल मे असली हु में इसलिए मैं बडा ।” असली के तन मन में लग गई आग, उसने जलकर कहा, “कसम खाकर कह कि क्या तो है तू ओर क्या हू मैं? पकली ने नकली कसम खाकर कह दिया, ' अच्छा तो सुन ! असली हू में गौर तू है कुछ नही का फूल 1” लेक्निजसली भी असली था। उसने पक्डा नकली का हाथ और कहा,' ऐसा हि.




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