सनाथ - अनाथ निर्णय | Sanath - Anath Nirnay

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Sanath - Anath Nirnay by सुजानमल - Sujanamal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१ सनाथ-अनाथ निर्णय... विरोषं अक्ति. भी नं थी । কহ নাহ वह जेंन-साधुओं को अप- मानितं करने की असफल चेष्टा भी करःघुका:था। जेन-साधुओं के प्रति भक्ति न होने पर और उन्हें अपमानित करने की भावना होने ঘক मीः. राजो श्रेणिक, उन मुनि: के रूप, से; ./इस प्रकार आकर्षित एवं प्रेभावित हुआ, कि:उसे यह याद दी न रहा, कि. ये मुनि रानी. चेलना. के उन्हीं: गुरुओं में से हैं, जिन्हें अंपमानित बाग में आया तो था केवल सनो-पिनोदे के लिए, लेकिन पूंचे- .. संचितं पुण्य के प्रताप से यहाँ उसे.सच्चे घमं कीः प्राप्नि होनी - : थी; इसलिए वह्‌ अपने हृद्य य के दुर्भावीं को भूल गेया. ओरः-~ त्तस्य पाएं उ वंदिता कोञण य पंयाहिरणँ ॥ नाडइदूरमणासन्ने पंजली ` पडिपच्छहं | ७ ॥ भावार्थ--राजा श्र णिक नें उन मुनि के चरणों को बन्दना करके, उनकी: प्रदक्षिण की ओर न बहुत समीपं नं बहुत दुर चैठ कर हाथ जोड़ वह उन मुनि से पूछने लगा ।. ` ` . ভর হালি. राजा ने, अपना वह सिर जो प्राण जाते भी -दसरे किसी के--और विशेषतः जिससे प्रेम नही है, उसके-आगे नहीं भुका:सकत्ता. था; मुनि के परों पर डाल दिया ॥ - फिर मुनि की प्रदक्षिण करके वह समभ्यतानुसार इस प्रकार बेठा कि न बहुत




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