गुणस्थानक्रमारोह | Gunasthanakramaroh

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Gunasthanakramaroh by तिलक विजय - Tilak Vijay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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। प्रथम वॉचनीय विषय । ~ ২... ৫৯ সি ॐ कभेकी सूल तथा उत्तर সন্ধলিষা। १ ज्ञानावरणीय, २ दशैनावरणीय) २ वेदनीय, ७ मोहनीय, ५ आयु, ६ नामकम, ७ गोत्रकमे, ८ अन्तराय । इन आठों ही मूल प्रकृतियोंका काये बताते हैं, ज्ञानावरणीय कमका कार्य ज्ञान गुणको दवानेका है। दशेना- चरणीय कर्मका कार्य दर्शन गुणकों आच्छादन करनेका है | वेदर्नाय कर्मका काय आत्माको सांसारिक सुख दुःखका अनुभव करानेका ` रै । मोहनीय कमैका काये आत्मीय चारित्र गुणको परगट न होने देनेका है। आयु कर्मका काये जीवात्माकों संसारमें स्थिति करा- नेका है । नाम कमेका कायं जीवको अनेक प्रकारकी आकतियां करानेका है । गोत्र कर्मका काय जीवको डच नीच दश्षायं भप्त करानेका है ।' अन्तराय कर्मका कायं आत्मीय अनन्त शाक्तिको रुकावट करनेका हे उन्तर प्रकृतियां । ज्ञानावरणीय कर्मकी उत्तर प्रकृतियें पाँच होती है ज्ञानयुण के पाँच भेद होते हैं, मतिज्ञान, भतज्ञान, अवधि ज्ञान, मनःपयेव ज्ञान, केवल ज्ञान, इस पूर्वाक्त पाँच प्रकारके ज्ञानभुणको आच्छा- दन करनेवाली-१ मतिज्ञानावरणीय, २ शुतज्ञानावरणाय, हे अव- पिन्ञानावरणीय, ४ मनःपर्येव ज्ञानावरणीय, तथा ५ केवल ज्ञाना- वरणीय । ये पाच प्रक्ृतियां हैं । ¦ | “ दर्शनशुणको दबानेवाली दशनावरणीय कर्मकी नव प्रकृतियां _ हैं, सो नीचे लिखे मुजब समझना.




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