विवेकानंद साहित्य जन्मसती संस्करण | Vivekananda Sahitya Janmshati Sanskaran Khand-8

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Book Image : विवेकानंद साहित्य जन्मसती संस्करण  - Vivekananda Sahitya Janmshati Sanskaran Khand-8

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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११ व्यायहारिफ जीवन मे वेदान्त (१) कारणवय हमारे समान उन्नति नही कर पाये, उनके प्रति घृणा करने का अधिकार हमे नहीं है। किसीकी निन्दा मत करों। विसीको सहायता कर सकते हो तो करो, नही कर सकते हो तो हाथ पर हाथ रसकर चुपचाप बैठे रहो, उन्हें आशीर्वाद दो, अपने रास्ते जाने दो। गाली देने अथवा निन्‍्दा करने से कोई उन्नति नही होती। इस प्रकार से कभी कोई कार्य नहीं होता। दूसरे की निन्‍्दा करने में हम अपनी दावित्त लगाते है! आलोचना मौर निन्दा अपनी दक्ति खचं करने का निम्सार उपाय है, क्योकि अन्त मे हम देते दै कि सभी खोग एक ही वस्तु देख रह है, कम~ वेश उसी आदर्श की ओर पहुँच रहे है और हम लोगो में जो अतर है, वे केवल अभिव्यक्ति के है। 'पाप' की वात लो। म अभी वेदान्त के अनुसार पाप की धारणा तथा इस चारणा की कि मनुष्य पापी है, चर्चा कर रहा था। दोनों वास्तव मे एक ही हैं केवल एक सकारात्मक है, दूसरी नकारात्मक है। एक, मनुष्य को उसकी दुवे-, लता दिखा देती है मौर दूमरी, उसकी शक्ति । वेदात कहता दै कि यदि दर्वल्ता है, तो कोई चिता नही, हमे तो विकास करना है। जब मनुप्य पहले-पहल जन्मा, तभी उसका रोग क्‍या है, जान लिया गया। सभी अपना अपना रोग जानते है--- किसी दूसरे को बतलाने की आवश्यकता नहीं होती। सारे समय---हम रोगी है---यह सोचते रहने से हम स्वस्थ नहीं हो सकते, उसके लिए औपघ आवश्यक है। बाहर की हम सारी चीज़ें भूल जा सकते हैं, वाह्य जगत्‌ के प्रति हम कपटाचारी हो सकते हैं, कितु अपने मत के अतराल मे हम सब अपनी दुर्वलताओ को जानते हैं। वेदात कहता है कि फिर भी मनुष्य को सदैव उसकी दुर्बलता की याद कराते रहना अधिक सहायता नही करता, उसको बल प्रदान करो, और बल सदैव निर्व- लता का चितन करते रहने से नही प्राप्त होता। दुवेछता का उपचार सदैव उसका चितन करते रहना नही है, वरन्‌ वरू का चितन करना है। मनुष्य मे जो शक्ति पहले से ही विद्यमान है, उसे उसकी याद दिला दो। मनुष्य को पापी ন बतलाकर वेदान्त ठीक उसका विपरीत मार्ग ग्रहण करता है और कहता है, तुम पूर्ण और शुद्धस्वरूप हो और जिसे तुम पाप कहते हो, वह तुममे नहीं है 0 जिसे तुम पाप' कहते थे, वह तुम्हारी आत्माभिव्यक्ति का निम्नतम रूप है, अपनी आत्मा को उच्चतर भाव मे प्रकाशित करो। यह एक वात हम सबको सदैव याद रखनी चाहिए और इसे हम सब कर सकते हैं। कभी नही” मत कहना, मै नदी कर सकता” यह कमी न कटना, क्योक्रि तुम अनन्तस्वरूप हौ । तुम्हारे स्वरूप की तुलना में देश-काल भी कुछ नही हैं। तुम॒ सब कुछ कर सकते हो, तुम सर्वेशक्तिमान हो।




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