प्रकृति पुत्र | Parkriti - Putra

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : प्रकृति पुत्र  - Parkriti - Putra
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about बाबूसिंह चौहान - Babu Singh CHAUHAN

Add Infomation AboutBabu Singh CHAUHAN

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
नकःर प्रकृति-पृत्र“और आज । आज कंसे माह्रा हुआ ?“आज तक अच्यायियों को भय था कि कही कोई मेरे चीत्कार सन कर मेरी सहायता को न दीठ पडे । इसलिए मश्े उन्होंने क्षत्रिम अद्ठहास बखे रने पर विवश किया। मेरी सिसकियाँ न निकलने दी, मृजे रोने की आज्ञा न दी । पर आज उन्हें विष्वास होगया कि मे निस्सहाय हूँ, मेरे चीत्कारो से कोड द्रवित नही होगा, मेरे चीत्कार किसी भी निद्रा- मग्त व्यक्ति को जागृत न कर सकेंगे | क्योकि सभी ने मेरे अतन्र की प्रम-हाला पी पैर पसार दिये है, तो मझे छोड दिया गया हैँ, चीत्कार करते-करते मृत्य का ग्रास हो जाने के लिए । वह লীলী।क्या तुम पर किसी को दया न आई 71^ दमा ? ४5०» दया की पूछते हो, दया तो मेरी सखी ठहरी । आज अहकार और क्रता ने दया का कोई स्थान नही छोडा है । आज मानव ने दानवता को अपनी प्रेयसी वनाया हं ! आज अन्याय समाज के विधान का अग हो गया है, और गोपषण धर्म का रूप धारण कर गया हेउसकी बात सुनकर धरती का हृदय आऽ्चयं चकित रह गया ।“कहाँ की बात कह रही हो तुम ?“यहाँ की, इस लोक की, अपने देश की, उसने तनिक आवेश मे आकर कहा, “समाज के अग-अग को पाप ने डस लिया हूँ, व्यभिचार इड्सान की रग-रग में समा गया है, मन अधकार की घोर कालिमा से भी अधिक काला पड गया हैं मानव का। सारा समाज विकरृत-सा हो गया हैँ, कण-कण में रोग हे, बुरी तरह से सड ,रहा हैं प्रत्येक अग। स्वार्थ, भ्रष्टाचार, छल, कपट, हिसा, घृणा, स्पर्धा, परिग्रह, वासना, शोषण, दुव्यंसन इत्यादि चहुँ ओर छा गए हे । इस वातावरण में सेरा दम घुटने लगा। मेने इसके विपरीत आवाज उठानी चाही, तो मेरा ही तिरस्कार कर दिया सभी ने । इतना कहकर वह फिर रो उठी।धरती का हृदय बोला, तुम फिर रोने लगी? रोने से कुछ नही बनेगा । रोना तो कायरता हें ।***““'हाँ, हाँ, आगे बोलो ? तुम पर क्या बीती ?“क्या कहूँ ? मेरी भरे बाजारों आबरू लूटी गईं। मुझे सरे




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now