समयसार | Samaysaar

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Samaysaar  by परमेष्टिदासजी न्यायतीर्थ - Parmeshtidasji Nyayteerth

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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৫ शब्दोंमें कहा जावे तो-'यह समयसार शास्त्र आगमोंका भी आगम है; लाखों शास्त्रों का सार इसमे है; जेनशासनका यह्‌ स्थम्भ है; साधककी यह्‌ कामधेनु है, कल्पवृक्ष है । चौदह पूवंका रहस्य इसमे समाया हुवा है । इसकी हरएक गाधा छट सातवें गुणस्थानमें भूलते हुव महामुनिके श्रात्म-भ्रनुभवमेसे निकली हई है। इस शास्त्रके कर्ता भगवान कुन्दकुन्दाचायंदेव महाविदेहक्षेतरमे सवेज्ञ वीतराग श्री सीमन्धर भगवानके समवसरणमे गये थे और वहाँ वे आठ दिन रहे थे यह बात यथातथ्य है, ग्रक्षरश: सत्य है, प्रमाणसिद्ध है, इसमें लेशमात्र भी शंकाके लिये स्थान नहीं है । उन परम उपकारी आचाये भगवान द्रारा रचित इस समयसारमे तीथ द्ुःरदेवकी निरक्षरी कारघ्वनिमेसे निकला हूवा ही उपदेश है । इस शास्त्रमें भगवान्‌ कुन्दकुन्दाचार्यदेवकी प्राकृत गाथाग्रोंपर आ्रात्मख्याति नामकी संस्कृत टीका लिखनेवाले ( विक्रमकी दसवी शताब्दीके लगभग होनेवाले ) श्रीमान्‌ अमृतचन्द्राचायंदेव हैं। जिसप्रकार इस शास्त्रके मूलकर्ता अलौकिक पुरुष हैं उसीप्रकार इसके टीकाकार भी महासमथं प्राचायं हैँ । श्रात्मख्याति जसौ टीका ग्रभीतक मी दूसरे कोई जेन ग्रन्थकी नही लिखी गई है 1 उन्होने पंचास्तिकाय तथा प्रवचनसा रकी भी टीका लिखी है ग्रौर तत्वाथसार, पुरुषाथंसिद्धच्‌.पाय ग्रादि स्वतन्त्र म्रन्थोकी रचना भी की है । उनकी एक इस प्रात्मख्याति टीका ही पठनेवालेको उनकी श्रध्यात्मरसिकता, भ्रात्मानुभव, प्रखर विद्वत्ता, वस्तुस्वरूपको न्यायसे सिद्ध करनेकी उनकी प्रसाधारण गक्ति आर उत्तम काव्यशाक्तिका पूराज्ञान हो जावेगा। ग्रति संक्षेपमे गंभीर रहस्योको भरदेनेकी अनोखी शक्ति विद्रानोको ्रारचयचकित करती है । उनकी यह देवी टीका श्र तकेवलीके वचनोके समान रै । जिसप्रकार मूलशास्त्रकतनि समस्त निजवेभवसे इस शास्त्रकी रचनाक है उसीप्रकार टीकाकारने भी ग्रत्यन्त उत्साहपूवंक सवं निज-वंभवसे यह्‌ टीका रची है एेसा इस टीकाके पदनेवालोको स्वभावतः ही निश्चय हुये बिना नहीं रह सकता । शासनमान्य भगवन्‌ कुन्दकुन्दाचायदेवने इस कलिकालमे जगद्गुरु तीर्थकरदेवके जेसा काम किया है और श्रीअमृतचन्द्राचायदेवने, मानों कि वे कुन्दकुन्द भगवानके हृदयमें बंठ गये हों उसप्रकारसे उनके गम्भीर आशयोंको यथार्थतया व्यक्त करके, उनके गणधरके समान कार्य किया है। इस टीकामें श्रानेवाले काव्य (कलश) अध्यात्म रससे और आत्मानुभवकी मस्तीसे भरपूर हैं। श्रीपद्यप्रभमलधारिदेव जसे समर्थ आचार्योपर भी उन कलशोंने गहरी छाप डाली है और आज भी वे तत्त्वज्ञानसे




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