मेरे द्वार तरु नीम का | Mere Dwar Taru Neem Ka

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पीले, रसीले, पके चुए इसके ।बटोरे हे गे,खेल उनसे खेले है । इसकी सूखी सीको से दाँत साफ किये है, कान खुजलाये है मीठे-मीठे सिहरकर ।अपने पुरातन की कभी शाखा को कटा देख, दिल मे दर्द हुआ है । द्वार को शानइसे समझा मेने ।इस प्राचीन पादप के कुछ ही पहले सेहोता है इतिहास शुरू मेरे विप्र-वश का, छोटे-से गाँव मे । सग-सग पुरखे केबीत गयी पोच पीटि्यो | मेरे पुरखेपले-बढेतरुवर के ऑगन मे । फिर यही से उन्होने शुरू की आखिरी गगा-यात्रा अपनी |साथ निभायेगा क्या अन्त तक अति परिय सखा यहमेरे वशधरो कावर्तमान ग्राम मे ?६




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