रामायण अयोध्याकाण्ड | Ramayan Ayodhyakand

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Ramayan Ayodhyakand  by गोस्वामी तुलसीदास - Goswami Tulsidas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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9 ०-71-1 1117141. 21 1-11-1 7 1 11 1, 11 1-1-18) -1/ 181 1114-1 11 1-1-11, अयेध्याकाण्ड रे ५ ८ उनकी सब सक्तषियाँ सद्देलियाँ भी प्रसन्‍न हैं । श्रीरामचन्द्र जी का छप, गुण, शोक ४ जीर स्वभाव देल सुन कर महाराज प्रसन्न द्वोते हैं। ४ १ दो०--सबके उर अभिलाष मस्त, कहहिं मनाई महेश । ए 1 माप अदत युवराज्ञपद्‌, रामह देहि नरेश ॥ १ सब लोगों की यह इच्छा है और इसके पूर्ण होने के लिये वे महादेव সা ४ ৃ को मना कर कहते हैँ रि महाराज अपने तामने श्रीरामचन्द्र जी छो युवराजपदे £ 1 पर अभिषिक्त कर दुं; प £ पक समय सव सहित समाजा । राजस्तभा रधघुराज् विराज्ञा॥१ ¢ सकल सकृत मूरति नरना । राम सुयश सुनि अतिहि उच्छा ॥ £ नृप सब रहदहि छपा अभिलाखे । लोकप रहि प्रीति ख्ख राखे ॥ ! 1 त्रिभुवन तीनि काल जग मादहीं। भूरि भाम्य दशरथ सम नादी ॥ १ मङ्कलमूल रामसुत जु । जो कु कुहिय थोर सव तासु ॥ ! ५ राव खभाव बुङ्कुर कर लीन्हा । बदनु विरेाकिमुङ्करल्तमकीन्हा ॥ ¦ 4 श्रवण समीप मये सित केशा । मनहू जटठरपन अस उपदेशा ॥ |! ४ नृप युवराज राम कहं देह | जीवन जन्म लाभ किन लेह ॥ ৃ টু पुक दिन भद्वाराज दशरथ सब द्रबारियों के साथ राजसभा में बैठे थे। और सब्र उत्तम कर्मी कीम्‌ मदाराज दशरथ, श्रीरामजोके सुयश के बडे ॥ उत्साह के लाथ सुन रहे थे | जिल महाराज दशरथ डी क्रपाके सव राजा अनिर [ ः छाषी हैं और भिनको प्रीति के लिये छेोकपाल भी उनके मुंह की ओर निहार! { करते हैं, उन महाराज दशरथ के समान भाग्यवान्‌ तीनों छोकों में और तीनों ' $ काछों में कोई नहीं हुआ ; क्योंकि मङ्गलो के मूर श्रीराम जो जिसके पुत्र हैं-इसके | 2! सम्बन्ध में जो कुछ कद्दा जाय-थोड़ा है | महाराज दशरथ ने साधारण रोति पे ! ॥ दपेण द्वाथ में ले अपने मकुट के ठोक किया | उस समय उनकी दशि केनपुरी के | ४ सफ़ेद बालों की ओर गयी. जे। मानों उन्हें उपदेश श्र रहै थे रि हे राजन्‌ ! भव | ॥ बुढ़ापा आ गया--आप श्रीराम जी के युवराज पद दे, अपना जीवन सफ़छ ॥ कर ले | | छ}, ৫27 ৫০ ০৯ कं जाओ प्ाछ पु छ प क... 5555 55555 মত আর 5 জজ জি 5 পিউ सवा = 5.5 सि.




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