तत्वार्थवार्तिक | Tattvarthavartik

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Tattvarthavartik  by डॉ हीरालाल जैन - Dr. Hiralal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मूल ४४ दिन्‍्दी एषट भूल पृष्ठ हिन्दी पृष्ठ होप और समुत्ोका विष्कम्स आदि १७० ३८० ; गंगा, सिन्धु आदि नदियोंकी परियार- र्मे श्राये हुए पर्ोकी सार्थकता = १७० ३८० | नदियोंका वर्णन १६० ३८७ जस्बूद्वी पका वर्णन १७० ३८० * भरतक्षेत्रका विस्तार १९० ইজল साध ज्षेत्रोंका नाम निर्देश ५७१ ८० ¦ विवह प्त पवतो व जेत्रोंका प्रथम ज्षेत्रका नाम भरत क्यों पड़ा ? १७१ २३८० , विस्तार १९० ३८८ भरत ज्षेत्र कद्दा है ओर उसके छह | डस्तरक़े क्षेत्र आदि दक्षिणके क्षेत्र खण्ड कैसे होते हैं ! १७१ ३८० । आदिके समान हैं १९१ ददप विजयाद्ध अर्थात्‌ रजतादिका वर्णन १७१ ३८१ ¦ भरतं व एेरावतमे काल विचार १९१ ३८८ हमवत श्रादि कत्र कहां है श्रौर उनमे | बृद्धि और हास किनका होता है इसका क्या-क्या विशेषता है ! १७२ | विचार १६१ ३८८ विदेहलेत्रके भेद तथा उनका विशेष वर्णान १७३ ३८२ । श्रवसर्पिंणी व उत्सपिणीका लक्षण १६१ ३८८ मेरुपर्बत कहा है और उसका अवगाह | कालके छु भेद व उनका परिमाण १६२ इय व व्यास आदि कितना है इस । अन्य भूमियाँ अवस्थित हैं १९२ ३८९ बातका विशेष विचार १७७ ३८२ ! दैमवतक हारिवर्षफ और दैवकुरबक रम्यक आदि क्षेत्र कहा है ओर उनमे | मनुष्योंकी आयुका णंन १९२ ३८९ क्या विशेषता है ? १८१ ३०६२ । उक्त मनुष्योंके शरीरकी ऊँचाई व हिमवान्‌ आदि पर्वतोंके नाम १८२ ३८३ , आहारका नियम १६२ ३८९ हमवान्‌ राद शब्दोंका अर्थ तथा | বিকট বীর स्थित मनुष्योंके समान उनकी स्थिति १८२ ३८३ | उत्तरे कषमि स्थितमनुष्य है १९२ ३८३ पवेताका रङ्ग १८४ ३८४ | विदेह क्षेत्रके मनुष्पोंकी आयु १९२ ६८९ परवेतोंको भ्रन्य विशेषताएँ १८९ ३८४ | विदेह ज्षेत्रके मनुष्योके शरीरकी प्वंतोके ऊषर चह सरोवरोका वणन १.४ ३८४ ऊँचाई व आहारका नियम १६२ २८६ प्रथम सरोवरके आयाम भौर विष्कम्भ भरतक्षेत्रके विष्कृम्मका प्रकारान्तरसे का वर्णन १८४ ३८४ वर्णन १९३ ३८९ प्रथम सरोवरे अ्वगाहका निर्देश १८५ ३८४ | लवणं समुद्रका विष्कम्म व मध्यमे प्रथम सरोधरके बीचके पुष्डरका परिमाण १८५ ३८५ जलकी ऊचाहैका परिमाण १९३ ३८९ श्रन्य सरोवरे व उनके पुष्करोके परि- चार महापातालोका व श्रन्य परातालो माणका विवेचन १८५ ३८५ का वर्णन १९३ ३८६ सूत्रमे आये हुए (तद्द्वि गुणद्िगुणःः जलकी धारण करनेवाले नागोका पदकी साथकता १८६ ३८५ व उनके श्रावासोक्रा वर्णन १६५ ३६० सरोवरोंमें रहनेघाली देवियोंके नाम गौतम दवीपका वर्णन १६५ ३६० थ उनकी धन्य विशेषताएँ. ३८६ ३८५ | लवण समुद्र कहाँ क्रितना गहरा है. १६४ ३६० चोद नदियोंके नाम व उनका হখান- सब समुद्रोंके पानीका स्वाद १६४ ३९० निर्देश १८७ ३८६ | जलचर जीव किन समुद्रोमे हैं आदि १६४ ३६० दो-दो नदियंमिं प्रथम नदीका पूं घातकीखण्डका वन १९४ ३९० सुद्र गमन निरूपण १८७ ३८६ | धातकीवरुडमे भरत आदि चेक दो-दो नदियों द्वितीय नदीका पश्चिम विष्कम्भ श्रादिका निरूपण १६५ ३६० समुद्रामिमुख गमन 1८७. ३८६ | पुष्कराधे द्वीपका वर्णन १९६ ६९४ गंगां, सिन्धु आदि नदियोंका पद्महद ध्व शब्दकी सार्थकता १६६ ३६१ आदि सरोवरोंसे उत्पत्तिका पुृष्कयर्थम॑ भरत श्रादि क्के वर्णन १८७ ३८६ विष्कम्भ श्रादिका वर्णन १६६ ३६५ [ १३]




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