द्विवेदीयुगीन पत्रकारिता और रचनात्मक लेखन का अन्तर्सम्बन्ध | Dvivediyugin Patrakarita Aur Rachanatmak Lekhan Ka Antarsambandh

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Dvivediyugin Patrakarita Aur Rachanatmak Lekhan Ka Antarsambandh by धारा सिन्हा - Dhara Sinha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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14 जो कुछ देखता है, उसकी यथातथ्य रपट लिख देता है । किन्तु साहित्यकार की संवेदनशीलता इतनी चरम सीमा पर पहुंची होती है ि समाय पौर जीवन की उन्हीं घटना को वह गदतम दृष्टि से देखता है जो उसके बन्तर्मन में सृजन ~ प्रेरणा का कारण बन जाती हैं । साहित्यकार के लिए यह भी आवश्यक नहीं हे कि किसी प्रत्यक्ष तथा यथार्थ घटना को देख कर ही उसके मन में सृजन - प्रेरणा उत्पन्न हो । उसका अवचेतन मन इतना संवेदनशील होता है, कि प्रत्यक्ष रूप से न देखने पर भी जीवन के किसी आयाम से उसके मन में सृजन - प्रेरणा का उदय हो सकता है 11 इस विवेचन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जीवन - क्रम त्था घटना ~ कम का साक्षात्कार पत्रकार के लिए पूर्ण रूप से तथ्यपरक होता हे | किन्तु वही साक्षात्कार साहित्यकार के लिए ऋष्यो, ज्ञानियौ जर >दव्य द्रष्टाजों जैसा अलौकिक होता है, जो दृष्टा - साहित्यकार के मन मेँ सृजन की अकुनाहट उत्पन्न कर देता है । और यह सब - कुछ साहित्य - कार के मन में अनजाते ही होता है, न्जस्कि संबन्ध मे क्यो, क्ब ओरकेसे ক ওটি আর অত এনে খত ছে ও ও এজ) অতি ও ও বি তি উকি 9 ভিউ খর ওর এজি এর বিডি সি উর ডন व গজ वार स्रजि कः अनिका) হার অল) গাহি হর ছিরে হিজরা) এত এ? গিরি ওর) বাড এরা) এজ, রর জেড পারি তা? (व्याः ससक, आतः 178 6८8 8६1४8 17180178६100 0? 018 414৮9702520 09501 178४ ८३/८8 ६118 88 18६82181 ६112४ 80088780 88 785 {0 3 18४80 8087 आए 89808 1६ 10 50८) {88407 ६18६ 06860168 8 10४81, 8 9107४ 5৮035 5 018 0 8/8 8 008. 171 00410 ৮295 1800985178৮ 1948 ৮০ 9৮406 ४० 090৮5 85 61798 80025800089 55 18 728 ५58 6178 68059 78983] 85 8 9८87८119 0010४ 9 88 ६8 {76074 107 ५118६ 18 ८८4६688 (010) ॥1* {0160 ४8४७ 9५५8४ 27? 20८08 ' 115 টী মলিন नैख्लं 1/8 4८४ 800 ९20 07 ८8 (3६८९८३८५ ০0171৪84155 ७ ०04.




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