श्रीमद्भगवद्गीता [भाग 3] | Shrimadbhagwadgeeta [Bhag 3]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| ही० ॥६॥ শীদজমন্তরীনা ` ५५१५ 1 अर्थ--- सबसे पहलें निष्कामकर्मीकी मिष्ठा, फिर भ्रन्त;:करणकी शुद्धि तिससे शमदमादि साधन हारा सब कर्मौका सन्यास । तिसमे वेदान्तवाक्योंके विचारके साथ भगवरूक्तिकी निष्ठा। तिंससे तत्वज्ञानकी निष्ठा । तिसका फल. त्रिगुणात्मका भ्रविद्वाकीः निबृत्ति छाया प्रारब्धानुसार' पांचभौतिक देहकी र्थितिपय्थैन्त जीवन्मुक्ति | फिर देह त्याग होजाने- पर ५ विदेहसुक्ति ” | रिरि पूर्वोक्त जीवम्सुक्तिकी दशम परभपुरुषाथके श्याश्रयसे परम - वैराग्यकी भाप्ति । तिसकी स्ता करनेवाली जो दैवी सम्पदारूप शुभवासना है, उसका ग्रहण चौर तिस बैराग्यकी विरोधिनी जो आसुरीसम्पदारूप अशुभ वासना हैं. तिसका सर्वदा त्याग । दैवी सम्पदाका असाधारण कारेण सात्तविकश्रद्य, और आसुरीसम्पदाका असाधारण कारण राजसी. और तामसी श्रद्ा | इनके ग्रहण और त्यागको' कथन करतेहुए भगवानने परम उत्कृष्ट तारतम्यके साथ गीताशाखत्रकी समाप्ति करदी है। े सव है-- परम तचखछके वोधः निमित्त तथा. ससार चन्धनसे ` चटकर भगवत्छरूप्मै लय होनेके निमित्त पहले, यन्तःकरणक्ी शुद्धि ही की आवश्यकता है जो निष्कामकस्मोके सांघनसे उत्पन्न होती है ।. बिना; अन्तःकरण शुद्धकिये हुए भगव्तकी. भोरं बुद्धि, मुरती ही नहीं, न' उसके. चरणोमे! श्रद्धा उसन्‍न होती| है। जैसे अलम्ते मलीन वस्मपर किसी प्रकारका सुन्दर रंग नहीं चढसकता। इसी प्रकार जबतक नाना- भकारेके पाप-कमकिं कारणः तथा काम; क्रोंक इत्यादि विकारोंके कारण प्राणीका अन्तःकरण मल्लीनः रहता है तबतक सहसूं यत्न करनेपर भी उसपर भगवूक्तिका रंग नहीं चढसकता |




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