श्री पंच प्रतिक्रमण सूत्र | Shri Panch Pratikarman Sutra

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Shri Panch Pratikarman Sutra by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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৫৪ पच-प्रतिक्रमण “~. ., .... = “ इ ¢ अन्वयाथ ---'सुहि एस! सुखियों पर -दुहिएसु दुःखियों पे अ' भौर “अस्संजएसु' गुरु की निश्रा से विहार करने वारे सुसा घुओं पर तथा असंयतों पर 'रागेण” राग से “व”-क्रेथवा- दोसेण देषु से मे! :मेंने. जा! जो 'अणुकंपा! ,दफ्या-- मक्ति-को.त उसकी निदे निन्दा-करता हूं “च' तथा तं उसकी रारिहामि गहं करता हू ॥ ३९॥ ~` , ` , \ ~ 4. छ ০8 दर ৬ বটি ভীত न्दू ष्य ज ज , - -भावाथ-- जो साघु ज्ञानादि गुण में रत हैं या च क वस्त्रपात्र आदि. उपधि वाले हैं, वे सुखी - कहलाते हैं |- जो व्यापि ४6 47 # से पीडितदै, तपस्या से खिन्न ह या ' वख पात्र -आदि . उपपि से विदीन ই ই दुःखी कदे जाते हैं। जो गुरु की निश्रो से उनकी आज्ञा के अनुसार--वर्तते हैं, वे साधु अस्वयूत कहते हैं। जो:संयमहीन है वे असंयत कद्दे जाते हैं। ऐसे :युखीः পা दुःखी, अस्वयत भौर असंयत साधुओं पर यह व्यक्ति मेरा सम्बन्धी दैः य कुलीन दै या .यह प्रतिष्ठित दे इत्यादि प्रकार के ममलभाव से. अर्थात्‌ राग चश होकर अनुकम्पा करना त्या प्रह कगाऊ है, यह जाति-हीन है, यह चिनौना है, इंसलियें इसे, जो कुछ देना हो, दे कर जल्दी निकाल दो, इत्यादि' प्रकार ++ = ^^ 4 ५ रणाद्यस्नक भाव से अर्थात्‌ द्र ष-वश होकर ' शलुकैम्पां ष কে | কে * इसकी इस गाथा में आलोचंना की गई है।। ३११०२ [हि गा साहू ;संविभागो, ऩःकओ:-तवचरणकरणजुत्त তা রি | क तेः ^फासु्थदाणे, तं; निदे च गरिामि॥ ३२




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