त्याग-पत्र | Tayag - Patra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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स्थाग-पज 4০रहा है। वह मेरे सामनेसे होकर अपने कमरेमे चली गई। जाते जाते द्वारपर रुकीं योर जोरसे पने हाथके बेतको दालानमें फेक दिया | बेंत मेरे पास आकर गिर गया।मेरी कुछ भी समझमें न आ रहा था। में सकपकाया-सा खड़ा था । थोड़ी देर बाद मैं साहसपूर्वक उस कोठरीमें गया। देखता क्या हूँ कि वहाँ बुआ ओंधी हुई पड़ी हैं। उनकी साड़ी इधर उधर हो गई है और बदनका कपड़ा बेहद मारसे मीना हो गया है | जगह-जगह नील उभर आंये हैं । कहीं- कहीं लट्टू भी छुलक आया है । बुआ गुम-सुम पड़ी हैं | न रोती हैं, न सुबकती हैं बाल निखरे हैं और धरतापर पढ़ी दोनों बाँहोपर माथा टिका है । मुझे वहाँ थोड़ी देर खड़ा रहना भी असह्य हो गया | मुमसे कुछ भी नहीं बोला गया। बुआके गलेसे लगकर मै वहाँ थोड़ा रो लेता तो ठीक होता । पर वह संभव न हुआ | मैं दबे पाँव लौट आया |वह दिन था कि फिर बुआकी हँसी मेने नही देखी। इसके पॉच-छुद महीने बाद बुआका ब्याह हो गया। मेने जल्दी-जल्दी तत्परताके साथ सब व्यवस्था कर दी । बुआकाः उसी दिनसे पढ़ना छूट गया था । वह उस दिनसे सीने-पिरोने,. भाड़ने-बुहारने ओर इसी तरहके और कामोंमें शांत भावसे लगी रहती थीं। काम करते रहनेके अतिरिक्त उन्हे और किसी बातसे मतलब न था! न किसीकी निगाहर्मे पड़ना चाहती थीं । कपड़ा कोई घोनीका घुला नया पहनतीं तो उदे जल्दी मैला भी कर लेती थीं । मुझसे वद्ध तब बची-बचीः




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