महावीर - वाणी | Mahavir - Vani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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: { १७ | सन्यासी, भि, क्षपण, अमण के लिये भी अधिकाधिक मात्रा में; उन अवच्छेपों को दिन दिन कम करते हुए, पर्मोपयोभी ह, जन धद सवथा लमयों (शर्तों ) से अनवच्छिन द्वो जाते हैं; तन “ मदामत ?? शे सथः भोक्च के ३९ देते दै | अर्दिस-घ~ च) अपतणम च; पततो -य भम्म्‌, अपरिन्नद्‌-वः ५डवन्जिथा पच मटन्वयाणि, चरिज्न धई जिणद्‌ सिय विदू ` धभ्मह्ुस -करणेक र्‌ आह्षण सूजाप्याथ के भ1१ वैसे ही हैं, जैसे महाभारत के शांति- पर में कहे हुए भायः बीस इस्णेकों के हैं, जिनमे से अत्येक के अन्तिम सन्द यद्‌ ई, तं ठन आक्षर विद | অন্ন में भी 5৫ প1ই79 অহী 2 में ऐस ही भाव के स्मकं | न जदाहि न थोत्तहि न जच्चा दोति माक्षणों;- यम्हिसच्प च पन्‍्मो व, सो छुनी) सो घ आक्षणो |: , न चाह माक्षण भूमि योनिजण मज्िन्सभ्मवे, অন্ষিএলপপাথানঠ নই গুলি দাগ | ( घम्मपद) ८ महावीर-वाणी ? में कह। है, अलोडप, मुह्ाीषि 'अणगाई अंकिषन/ 2 ४ अससत्त गिह्त्येसु, তর ৭৭ ও ৮15৩ 1 -




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