श्राद्ध | Shraddh

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Shraddh by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दापो दि्गबर ५. हाटकं पर हुये अन्याय को वह सदन नदीं कर सका † उद्रकं चेहरा स्याद शे गया ) बह आगे कुछ कह नदीं सका | यह दशा तो दिगम्बरपंत की थी, तब दासों की माँ के मातृ-दृदय ने इस आघात को कैसे सहन किया द्ोगा ! उसके हृदय की दक्शाः वर्णनातीत है। परन्तु परिस्थिति को देखकर उसने स्वर्य को संभाला और पति फो मी आश्वस्त कर सम्पूणं घटना की जानकारी प्राप्त की । पति-पत्नी दोनों इस बात को समझ गये कि बादशाह दासो को भुसलमान बनाना चाहता है, इसौलिये उसने वना सारी अ्थ- दण्ड दिया है। बादशाह दासो को भुसलमान बनाना चाहता था, इसलिये उसने बलात्कार के बजाय युक्ति से काम लेना चाह- द्वाक्षे खजूरमसाअ ` उसने दासो को खुश करने के लिये उसे नित्य एक एक अशर्फी देना शुरू किया | दाखो को सी विश्वास हो गया कि उसके पिताजी पौच लाख अशर्फी दे नहीं सकेंगे और उसे मुसलमान बनाना ही पड़ेगा | रात्रि का समय था | चारों ओर चांदनी छिटक रही थी। शांत वातावरण मे दासो अकेला बेठा हुआ आते भाव से विचार सग्न है-'' इस सृष्टि में मेरा कौन है ? मानव भगवान की इस विशाल सृष्टि में मेरा-मेरा करके जीवन विताता है, परन्तु भगवान के अतिरिक्त सुख-दुःख का कोई दूसरा साथी नहीं है |” इस विचार में डूबा हुआ दासों अन्तःकरण से जगदम्बा का स्तोच गाने लगा। विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे, जले चानले पवत शघमध्ये अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाही गतिस्त्व॑ गतिस्त्व॑ त्वमेका भवानी ॥ माँ ! इस जगत में मेरा कौन है ? मेरे संसारी सम्बन्धियों में से मेरे पीछे कौन है! दे माँ) विवाद, विषाद, प्रमाद, प्रवास, जल, अग्नि, पर्वत, बन तथा शब्रु्ों के बीच में तू ही मेरी रक्षा करने वाली है | तू ही मेरी एक मात्र गति है | सिद के समान वेरुस्वी दासो ने दन्त भगवान की आराधना शुरू कर दी ! चष “* दिगम्बरा दिगम्बरा श्री पादवह्छभ दिगम्बरा ? शख प्रकार वद्‌ दत्त भगवान भजन करता और जो अशर्फी उसे मिल्ती, नित्य उसका दान कर देता था । दासो की भक्ति की सूचना एक दिन बादशाह- के पास पहुंच হাই | बादशाह दातो के पास आया और उसे লমতাদি জবা दाघो ! तुम जैसे चतुर और बुद्धिमान व्यक्ति को व्यर्थ हतना कष्ट नहीं उठाना चाहिये | तुम छुद्र हिन्दू जाति में पैदा हुये हो, यही मेरे लिये दुःए बी बात है| वुम चिंता छोटबर मुसलमान बन जाओ फिर मेरा यह सम्पूर्ण वेमव ठुग्दारे चरण चूमेंगा।




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