रूडिन | Roodin

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Roodin by वीरेंद्र नाथ मंडल - Veerendra Nath Mandal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ११ )] सुन्दरताओं में सब से अधिक निखर उठती थी उसके सुन्दर मुख की भावालुता जिसमें नम्नता थी, आत्मसमर्पण था और दया थी । उसका भावभय मुख सभी को भावुक बना देता था और अपनी तरफ खींचता था । एक शिशु की भाँति उसकी दृष्टि थी ओर हँसी थी। वहाँ की और-ओर सुन्दरियाँ समझती थीं, बेचारी बहुत ही सीधी है । इससे अधिक एक स्त्री को और क्या चाहिए ९ -- “आपने कहा न, मैदाम लासुनस्काया मे आपको मेरे पास भेजा है ९? उसने पांडालेबस्की से पूछा । --हाँ। मैद्म ने मुझे भेजा ।” उसने अस्पष्ट स्वर में उत्तर दिया । उसके उच्चारण में विशेषता थी। “मैदम ने आज विशेष कर आपको उनके साथ मभ्याह्न-भाज मे सम्मिलित होने के लिए श्ननुरोध किया है । मैदम--? पांडालेषस्की जव किसी महिला का उल्लेख करता था तब वह बहुत ही सावधान रहता था कि कि कहीं संबोधन में व्यक्तिगत सम्पके का आभास न मिल जाय ।-- “आज मेदम एक नये अतिथि से आपका परिचय कराना चाहती हैं |? -- बे कौन ह १ ভি पीटसंबर्ग के बैरन मफेल, वे एक अतिष्ठित হাজ- कर्मचारी हैं। प्रिन्स गेरिन में थोड़े दिन हुए मैदम लासुनस्काया से उनका परिचय हुआ है। सुशिक्षित और संस्कृतिसंपन्न युवक होने के कारण मैदम उनकी बड़ी प्रशंसा करती हैं ! फिर बैरन महोदय भी साहित्य में रुचि रखते हैं, ओर--अरे ! कितनी सुंदर तितली देखिये! जरा देखिये |--हाँ क्‍या कह रहा था ९--और अथेशाखतर में । उन्होंने उसी विषय पर एक आकर्षक निबन्‍्ध लिखा है जिसके सम्बन्ध में वे मैदस का अभिमत जानना चाहते हैं |” '-- अधैशास््र पर. निबन्ध लिखा है ९”




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