अथर्ववेदभाष्यम भाग 4 | Atharwedbhasyam Bhag 4
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
49 MB
कुल पष्ठ :
268
श्रेणी :
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No Information available about क्षेमकरणदास त्रिवेदी - Kshemakarandas Trivedi
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)সঃ হ [৪৪] चच्चम काण्ड्स ৪২৪ ( ८२७ )दर्धाति । अवि-अनत् । च॒। वि-श्नत् । च। सस्नि।
सम् ।' ते । नव॒न्त । मनन््भ ता । सदबु ॥२॥জাত ( सवसा ) वल से ( वद्बधानः ) बढ़ता हुआ, ( भूयोज्ञाः )
महावली, ( शत्र : ) हमारा शत्रु ( दासाय ) दानपात्र दास को ( भियसम् )
मय ( इधवात्ि ) देता है । ( अन्यन् ) मतिश्ूल्य, स्थावर, ( च ) श्रौर (व्यनत् )
गतिवाला जङ्गम जगत् ( च ) निश्चय करके [ परमात्मा में | ( सस्नि ) लपेदा
हुआ है, ( प्रभृता ) अच्छे प्रकार पुष्ट किये हुये घाणी ( मदेखु ) आननदों में
( ते ) तेरी ( सम् नवन्त--०-न्ते ) यथावत् स्तुति करते हैं ॥ २॥भावाथ-सर्व शक्तिमान् परमेश्वर লহ जगत् मं व्यापक होकर
सव को धारण करता! उसी की महिमा को जानकर सव मदुष्य पुरूषाय
पृवंक श्रपने विघ्नो का नाश करके प्रसन्न होवे ||त्वे क्रत॒मपि पृञ्चन्ति भूरि द्वियंदे ते चरिभवन्त्यूमः ।के मि क स्वादुनां ® > ॥
स्वादाः स्वादोय: स्व् सजा सम॒दः सु मच मध -
লাল येचोी: ॥ ३ ॥जकन भ मःर-( वाद्धरानः ) इधु--कानच. । वध मानः ( शवसा) श्वे; सम्प्र
सारण च । उ० ४ । १५३ । इति दुश्रोश्व गतिड्द्धयोः-श्रस्छन् । शवः = वलम्-
निघ० २।६। बलेन ( भूयांजाः ) बहूबलः ( शत्र; ) शातयिता । रिपुः विघ्नः
( दासाय ) दासु दान-घञ् । दानपरा्राय सेवकाय ( भियस्म् ) दिवः कित् |
उ० ३ । १। १८१ । इति जिमी भय-अस्तच् । मयम् ( इध्राति ) ददाति (अव्य
नत् ) श्र+वि + श्चन সাবান, বালী আ-হান | अनिति गतिकर्मा-निघ० २। १७ |
गतिश्ुन्यं स्थावरं जगत् ( च ) ( व्यनत् ) विविधं गतिवज्ञगमं जगत् (च)
श्रवधारणे (सस्नि) आदगमहनजनः किकिनौ ल्िर्च | पा २।२। १७९ |
शौ वेष्टन-किन् । यद्वा, ष्णा शोचे- किन् | आते लोप इटि बच | पा० ६। ४ |द । श्राकारलोपः । सस्निं मेघं संस्नातमू--निरु० ५। १। परमांत्मनि
देष्टितम् (ते) तुभ्यम् ( खम् नवन्त ) छन्द खमास्मने पद् लटि रूपम् । नवते
गतिकमां-निघ० २) १४। नवन्ते नुषन्ति । सम्यक.स्तुवन्ति, संगच्छन्तेवः
( प्रमृता ) प्रसृतानि प्रकषंण धतानि पोदतानि वा ( मदेषु) पेषु
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