रुसी इतिहास का सर्वेक्षण | Rusi Itihas Ka Sarvekshan
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
19 MB
कुल पष्ठ :
473
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)सीमास्थिति और गर-रूसियों अथवा (लाल) हिन्दियों की परिवर्त्तनशील प्रतिरोधी
शक्तियों के कारण बस्तियाँ वीरान प्रदेण में दन्तुर हूरई' भौर जिह वाकारमे आगे
बढ़ीं । रूस तथा अमेरिका दोनों देशों में सबसे अधिक कृषक ही जंगल तथा समतल
के खानाबदोशों को खदेड़कर आगे बढ़ । गत शतती में उत्तरी अमेरिका में सर्वप्रथम
हल से चारागाहों को जोता गया । इस कारण भूमि का शोषण बहुत तेजी से बढ़ने
लगा ओर यह अप रदन श्रव अव्वल दरजे की राष्ट्रीय समस्या बन गई है। किन्तु,
रूस मे यह् सव गम्भीर, पर कम विनाशक रूप में हुआ, क्योकि यहाँ विकास की गति
फुछ मनन््द थी और पिछले बारह वर्षों के पहले भूमि पर यन्त्रों का प्रयोग कुछ कम
ही हुआ ।बहुत प्राचीन काल से ही रूस के शिकारी, मछुए तथा मधुपालक कृषकों से आगे
रहे। समूर, शिकार मत्स्य, मधु एवं मोम से आच्छादन, भोजन तथा प्रकाश का
काम चल जाता था। साथ ही, इन्हीं से करों का भुगतान हो जाता था रईसों के
लिए विलास-सामग्री जुट जाती थी तथा प्रारम्भ में रूसी निर्यात के लिए प्रधान
घस्तुएँ मिल जाती थीं। शिकारी तथा व्यापारी प्रायः वही होते थे। कभी-कभी
ये नदियों में डकैती करते तथा लुटेरे सवार भी बन जाते थे। निश्चय ही, इन
लफन्दरों की छोटी टोलियों के आखेट-क्षेत्र भी अनिश्चित थे और सदा बदलते रहते
धे। देश विशाल थ्रा। लोग कम थे। वन्य जन्तु के स्थानान्तरण तथा आगे जो
कुछ अशोषित पड़ा था, उसकी कद्वानियों पर ही इनका संचालन भी निर्भर था।
पंप, अथलिप्सा, साहस, फन्द भौर नैपुण्य का अभिमान, जाल, धनुष. डोंगी तथा
धुठार ने मिलकर सीमा को पूर्व और उत्तर में आगे ढकेल दिया। कालान्तर में
धॉल्गा के कनीय राजकुमारों ने तथा नवगोरोद के साहसी व्यापारियों ने मिलकर
_स सीसा को बढ़ाने में और सहयोग दिया। दक्षिण की बात दूमरी रही। वहाँ
'टेवीज के तातार लोग मजबूत थे और रूप्ती सीमान्तवासी चिरकाल तक अपने बचाव
में ही लगे रहे, किन्तु अन्ततः सोलहवीं शत्ती में कजाक वहाँ भी पहुच ही गये । वे
फजाक रूस के सर्वप्रसिद्ध सीमान्तवासी शिकारी थे ।लकड़हारों ने अपने तरीके की एक नई ही अग्रसीमा निभित की। इस क्षेत्र
मे उस्ने किसी हृद तकं केवल गत सौ वर्षो में ही दक्षता प्राप्त की। खनकों
की सीमा और भी नूतन है और स्थान 1700 ई० के पूर्व की न हो सकेगी, जब
परहान् पीटर ने बहुत अंशों में एक नये लौह तथा ताम्र-उद्योग की स्थापना प्रधानतः
उरल-प्रदेश में किया था एवं निश्चयात्मक ढग से साइवेरिया में स्वर्ण और रजत की
खोज में आगे बढ़ा था। स्वर्ण-लिप्सा के कारण एक नये प्रकार की खनक-सीमा
बनने लगी गौर इसका अपना विशेष इतिहास है। यद्यपि सोवियत विकाम से संध्र
को दक्षिण अफिका के बाद संसार में स्वर्ण का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक (देण)
बना दिया है, फिर भी सोने का उतना महत्त्व नहीं रहा है, जितना कम मृल्यवाले
धातुओं का । पीटर के समय से ही राज्य ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृपक दामों(5)
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