आदर्श चरितावली | Adarsh-charitavali

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Adarsh-charitavali by पंडित शिवमहाय चतुर्वेदी -pandit shivmahaay chaturvedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ८ ) लिय एक तरह स श्रसम्भवथा । इसी लमय उस गांव के समीप निम्नोजाति के बालकों के लिये एक पाठशालां खोली गई । बालक बुकर दिन भर तो माता पिता के साथ खानिपर काम करता था और रात के समय उस पाठशाला में जाकर पढ़ता था | धीरे घोरे उसकी विद्याभिरुकच्षि और भी बढ गई और वह सन्‌ १८७२ ई० में हेम्पटन नगर के नार्मल स्कूल में जाकर पढ़ने लगा | उस स्कूल के संस्थापक आर्मस्ट्रांग बड़े परापकारी थे | बहुतर अनाथ, गरीब ओर असमर्थ नीग्ो बालक उनके धात्सलल्‍्य से उस््र स्कूल में शिक्षा पाते थे। घाशिंगटन भी उनकी रूपा से तीन चार वष में ग्रेज्युणपट हो गया। इस म्कूल में उसे ज्ञों शिक्षा दी गई थी उसका सार यह था कि-- ऊपुस्तका के ढारा सीसी हुई विद्या से, वह विद्या विशेष उपयागी हाती है ज्ञो लत्दुर्पों को समलगति से प्राप्त होतो है । २--शिक्षा का मुख्य उद्दश्य परोपकार करना ही है। मनुष्य की उन्नति कवत्त मानसिक उन्नति क्यनसटी नदी हानी बरन उसक् साथ शारारिक भ्रम को सी बडी आवश्य- कता पड़ती हैं। आत्म विश्वास आर स्वाधीनता ये दोनों अमूल्य रत्न परिश्रम ही से प्राप्त होते है। जो लोग दूसरों के सुखी और उन्नत बनाने में ध्रम करते है | उन्हीं का सच्चा লুজ प्राम होता है और वही साग्यवान है। ३--मन. ज्ञान श्रौर कर्म की एकता किये बिना शिक्षा सफल नही हो सकती है । शिक्ता आर भ्रम का बड़ा सम्बन्ध हैं। जिस शिक्षा से भ्रम से श्ररुचि उत्पन्न हो बह शिक्षा दी नहीं है । ओर न ऐसी शित्ता से कोई लाभ द्वो सकता है।




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