आज की रजनीति | Aaj Kii Raajaniiti

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Aaj Kii Raajaniiti by राहुल सांकृत्यायन - Rahul Sankrityayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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स्वतन्त्र-भारत २ हमारी मासिक पत्रिकाओं के पूरे पृष्ठ को एक पंक्ति में जरूर आता । वह समाजवाद के समथक हँ, उन्हें पंचों में सबसे गर्म स्वभाव का कहा जा सकता है । वह जिस समाजवाद को चाहते हैं, वद्द क्रिसी एक पार्टी के भीतर सीमित नहीं है। उनका कहना द्ै--जों भी ईमानदारी से समाजवाद की स्थापन। के लिए क्रियात्मकरूपेण प्रयत्न कर रहे हें, उनको एक होकर काम करना चाहिए। युनिवर्सिटी से निकले श्रमी एक ही साल हुआ है, इसलिए उन्हें दुधर्माहा बच्चा न समर लें। उन्होंने सारा समय देश की समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने ओर समभते में लगाया है। चौथे पंच श्री भगवानदास जी आयु में सारी मंडली मे दूसरे नंबर पर हैं | सादगी के तो मानो अवतार हैं। मंडली में और लोग कर्चा पायजामा को भी सद्य कर लेते हैँ, लेकिन भगवानदास जी पंचकच्छी धोती ओर बृन्दावनी चौबन्दी पहनते हैं। उनके सिर पर शिखा भी गाय के खुर से थोड़ी ही कम है। ललाट पर भस्म-त्रिपुड और ऊपर से बह्लभशाही सूचम लाल उर्वं-पुरुड्‌ भी लगा है) वह समन्वय की साक्तात मूति हें । उनका कहना है- काशी विश्वनाथपुर में रहने के नाते “नदी में रह मगरमच्छु से वर” करना अच्छा नहीं, सोच भस्म का त्रिपुरड धारण करना जरूरी ই। लेकिन, सात पीढ़ी से खानदान वल्लभकुल का शिष्य रहा है। गोपाल-मन्दिर में लगाई उनके परदादा की देवोत्तर संपत्ति से आज भी वहाँ मनों मेवा-पभ्वान्नों का भोग क्गता है। इसीलिए वल्लभकुल का तिलक लगाना भी आवश्यक दै। भक्ति और धमम-प्रेम तो उनके वंश में चला आया है, और हम कह सकते हैं कि देशाचार में ग्राह्म को छोड़कर बेईमानी से वह ब दूर रहते हैं । पिता ने अपने पुत्र को पक्का धर्मात्मा बनाना चाहा, इसीलिए अंगरेजी या दूसरी शिक्षा न दिलवा घर पर हो पंडित रखके बेट को संस्कृत पदाना श्रारंम कराया । भगवानदास श्रभी तरुण है, लेकिन उसी काशी के निवासी पित्तामह डा० भगवानदास कौ उन्होने




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