प्रेमचन्द और गांधीवाद | Premachand Aur Gandhi Vaad

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Premachand Aur Gandhi Vaad by रामदीन गुप्त - Ramadeen Gupt

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about रामदीन गुप्त - Ramadeen Gupt

Add Infomation AboutRamadeen Gupt

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
विषय-प्रवेश इसे हिन्दी-उपन्यास का सौभाग्य ही कहना चाहिए कि उसे अपने शैशवकाल में ही प्रेमचन्द-जैसा महांप्राण व्यक्तित्व, सामाजिक चेतना-सम्पन्न साहित्यकार और समयं लेखक प्राप्त हो गया। प्रेमचन्द के आाविर्भाव से पूर्व हिन्दी-उपन्यास अपनी किशोर-सुलभ मनोवृत्ति के श्रनुकूल ऐयारों और जासूसों के ऐन्द्रजालिक रौर साहसिक त्यो से मन धहलाने एवं अपनी कुतूहलवृत्ति तथा चमत्का र-प्रियता को शान्त करने कौ चेष्टा मे संलग्न था। इसमें सन्देह नहीं कि हिन्दी के प्रथम उपन्यास 'परीक्षा-ग्रुर' (१८८२ ६०)* के १ ,शन-काल से लेकर 'सेवासदन' ( १६१४-१८ ई० )' के प्रकाशित होने तक हिन्दी- ` उपन्यास में प्रचुर परिमाण में वृद्धि हुई ; पर उसे एक जीवन्त व्यक्तित्व, साहित्यिक ^ रौर सामाजिक चेतना प्रदान करने तथा ऐयारों के फोले, लखलखे और “खुल 1 सिमसिम' के कल्यना-लोक से निकालकर सामाजिक यथार्थ की ठोस भूमि पर प्रतिष्ठित करने का श्रेय प्रेमचन्द को ही है। तिलस्मी-ऐयारी ओर जासूसी उपन्यासों के अतिरिवत प्रेमचन्द से पूर्वं जो सामाजिक उपन्यास लिखे भी गए; वे नीति-उपदेश के प्रत्यक्ष चित्रण से बोभिल, अतएव यान्त्रिक तथा रूढ़िग्रस्त थे। शुष्क उपदेशप्रद सुर्वितयों और शिक्षाप्रद संवादों की भरमार और पात्रों के अमनोवज्ञानिक चरित्र-चित्रण के काररा ये उपन्यास उस युग के पाठकों को भी अधिक श्राकपित नहीं कर सके । सामाजिक समस्याओं ' का चित्रण भी इन उपन्यासों में अधिकतर परंपराभुक्त और सामाजिक यथार्थ से कोसों दूर है। प्रेमचन्द ने हिन्दी-उपन्यास को नवीन विपय-वस्तु और नवीन पात्र ही नहीं दिए अपितु एक नवीन सामाजिक-राजनी तिक चेतना और एक नवीन यथार्थवादी शैली भी दी। १. हिन्दी उपन्यास : शिवनारायण श्रीवास्तव, प०.२७ (वाराणसी, सं० २०१६) २. वही, ए० ७६ “उस युग में जो सामाजिक उपन्यास लिखे गए उनका उद्देश्य उपदेश देकर समाज-सुधार करना था | >८ >< >< >< >८ >< >€ प्रारम्भिक युग के लेखकों ने श्रधिकतर नीति-उपदेश-प्रथान उपन्यास लिखे जिनमें आदर्श विधार्थी केसा हो, आदर गृिणी के क्या युण ई, श्रादशा भित कैसा दोना चाहिए, हिन्दुल के क्या आदर्श हैँ, चरित्र-वल में कितनी शक्ति दे, सत्यपालन की क्या मद्दत्ता दे, जुश्राखोरी, मयपान एवं कृसंगति से क्या द्वानियाँ द्वोती द--आयः हन्दीं के प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया | >< >< >< >८ >< > द्म प्रकार म देखते दे कि प्रेमचन्द के पूर्व तक हिन्दी में वो सामाजिक उपन्यास लिखे गए उनमें समाज के वास्तविक खद्य एज्ें उसकी বর্ম समस्याक्रों के यथाथ चित्रण का प्रयात नदीं के वरावर दे 1? व्री, ¶० २१-२४




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now