अहिंसा प्रवचन | Ahinsha Pravachan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अहिसा के आदर्श, सिद्धान्त श्र आचार ७( खुहारी ) आदि जो गुण, और प्रार्थना, यध-नियम, प्रेम बगेरा जो जीवन-चर्याएँ इस प्रकार की निष्ठा ( एतकाद ) पैदा करे--उन सवका नाम ईश्वरोपासना और श्रद्धा है ।>৯अपेक्षित आचार१ ऊपर कहे हुए आदर्शो और सिद्धान्तो की सफलूता के लिए जीवन में जो कुछ परिवर्तन करने की जरूरत महसूस हो और उसके लिए जो कुछ कुरबानी करनी पडे, उस फेर-बदल और कुरवानी के लिए अहिसा के साघक को हमेशा तैयार रहना चाहिए ।२ अहिंसा के अमल की जुरूआत सबसे पहले उसे अपने व्यक्तिगत जीवन से ही करनी होगी । इसलिए उसके अपने रिग्तेदारों, साथियो, पंडौसियो और अगल-बगलरू के समाजो से उसका बर्ताव अहिसामय ही रहना चाहिए । उन सवसे उसका वतविप्रेम काही होना चाहिए । और मतभेद होने पर या उनके किसी अन्याय या बुरे काम का मृका- वला करने का मौका आने पर उसे अहिंसा से ही काम लेना चाहिए। बल्कि किसी भी साधक को अपने गरीर, धन या इज्जत की हिफाजत के लिए या अपने साथ किये गये जन्याय को दूर करने के लिए दीवानी या फोजदारी अदालतो या पुलिस की मदद नही लेनी चाहिए ।३ उसे अपनी या अपनी कौम की जान, मिलकियत या इज्जत वचाने के लिए अथवा लडाई-झगडो को दवा देने के लिए हिसक उपाय वाम में लाने का विचार तक नही रखना चाहिए। वल्कि अहिसा के ज़रिये ही इन मसलो को हल करने का रास्ता खोजना चाहिए औरज़रूरत होने पर मौत या दूसरी तरह की आफतो को जोखिम भी उठानी चाहिए।




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