प्रत्यक्षजीवन शास्त्र खण्ड-1 | Pratyakshajivanshastra Khand-1

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Pratyakshajivanshastra Khand-1 by प. हीरालाल शास्त्री - Pt. Heeralal Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बचपन, विद्याथिकाल (जोवनेर में) [ ११ किया । अपने पांचों छोटे भाइयों के विवाह मेरे जन्म के श्राटेक साल के भीतर उन्होने कर दिये, एक भाई का विवाह दो वार किया । पर वे खुद उस जमाने में ओर उसे उम्र में जैसे के तैसे एकाकी विधुर ही बने रहे । मेरे दो छोटे काकाजी परदेश' में रहते थे । उनमें से एक की सगाई हुई तव उनको बुलाने के लिए उधार पैसे लाकर तार दिया गया तो उनका जवाब आया कि सफर खर्च भेज दो तो मैं श्रा जाऊं । विवाह की लागत का रुपया वे लाएं, इसके वजाय उनके खुद के आने के लिए सफर खर्च भेजा गया तव वे आये । ऐसी कमाई वे करते थे। ऐसी हालत में ही लगातार तीन विवाह कुछ महीनों के भीतर हुए तो गांव वालों ने समझा कि ये लोग बड़े “भागवान” हैं। उत्त दिनों ५०० रुपये लगा दिये जाते तो लड़के का विवाह वहुत अच्छा समझा जाता था । मेरी माता का देहान्त मेरे नानेरे में हुआ था । मेरे पिताजी हम दोनों को लाने के लिए ससुराल गये थे । उन्हीं दिनों उनके वहां रहते ही मेरी माता चल वसी । तो भेर पिताजी मुझको अकेले ही लेकर जोवनेर पहुंचे। घैँघली सी भलक पड़ती है कि मेरे पिताजी मुझे अपने कंधे पर विठा कर लाये थे । मेरी दादी ने पूछा, भाया श्रीनाराण-- ` वीनस क्ठे ? पर वीनणी तो स्वगे सिधार चुकी थी । घर में कुहराम मच गया । उस सारे हृइ्य के विचार मात्र से मैं आज भी कांप उठता हूं। मुझे पड़ोस में रहने वाली कानी नाम की गूजरी माई के स्तन से टू पिलाने का इन्तजाम किया गया। कानी. माई को जब तक वह जिन्दा रही मैं मानता रहा। वह चेहरे मोहरे से मुझे “क्वीन विक्‍टोरिया” सी लगती थी । मेरी दादी और वबुहा ने मुझे पाला। छः भाइयों के परिवार में मैं बिना माता का अकेला और भाग्यशाली समभा जाने वाला एक मात्र कच्चा था। इसलिए मेरा वेहद लाड़ प्यार हुआ । जो कुछ होता सो मेरे लिए ही होता । मेरा कोई पांतीदार नहीं था। इसलिए में इकलखोरा वन गया । कभी में मामुली सा भी वीमार होता तो मेरी दादी और तमाम घर वाले मुझे घेर कर बैठे रहते और मेरी दादी को म यह्‌ कहते सुनता -- “भगवाव ई हे सारी पीड़ा मने दे दे” एक वार मुझे बुरा र था उसी समय किसी पड़ौसी का लावणा आया, सो मेरी दादी ने मुझे थोड़ा.सा झिला दिया। मैंने खा लिया तो वह्‌॒वहुत खुश हुईं । परच्तु मेरे बुखार ने तो आखिर टाथफाइड का रूप ले लिया । लगातार दुवारा टाइफाइड हो गया और मेरी ऐसी हालत हो भयी कि मेरे बचने को आझा छूटने लगी। उसी हालत में मुझे छोड़कर मेरे पिताजी रातों रात पैदल चलकर १० कोस दूर एक गांव पहुंचे जहां एक झ्रादमी में किसी एक स्वर्गवासी बावाजी का भाव आता था । वावाजी ने मेरे पिताजी से कह दिया--“भोला, जा बच्चो ठीक हो जासी ।” मैं बच्च गया । है मैं शायद ६ साल का हुआ तब मुझे मदरसे विठा दिया गया था। जोवनेर के बशस्वी ठाकुर साहब कणंसिहजी ने मेरे जन्म के पाचक साल पहले ही जोवनेर में हाई स्कूल खोल दिया था। उक्त हाई स्कूल को ठाकुर साहव कर्यू्सिहजी के सुपुत्त रावल साहब




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