हजारी माल ग्रंथमाला का भाग 3 | Hajari Mal Granthmala Ka Bhag 3
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
302
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[২]प्रभू विरद विचारे सायत्रा। कड ग्रहों गरीब
निवाज । शरण तुम्हारी श्रायोहो ! हुं दाकर निज
चरना तसो । महारो सुखिये श्ररज प्रवाज ॥। श्री ०
६ ।॥ तु फरुणा कर ठाकर हो। प्रभु घरम
-दिवाक्र जग गुरू । केइ भव दुपदुकृत टाल।
विनयचंदने श्रापो हो । प्रमु निजगुण संपतसतास्वती
प्रम दीनानाथदयाल ।। श्री० ७।। इति ॥॥
२-ओीच्रजितनाथजीका स्तवन
॥ ढाल कुविसन मारग माथे रे घिग ॥ ए दशी 11
श्नौ लिन श्रजित नसौ जयकरी । तुम देवनकौ
` देवजो । जय शन राजाने विजाया राणो कौ।
श्रत्तम जात तुमेचजी । श्री जिन श्रज्ित नमो '
जयकारी (1 देर ॥ १ ॥ दूजा देव श्रनेरा जगमें,
ते मुझ दाय न शआावेजी ।। तह, सन तहु चित्त
हमने एक, तुहोज भ्रधिक सुहाबेजी 1 श्रो० २ ॥
सेव्या देव घणा भव २ में। तो पिशा गरज न
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