काव्य में अभिव्यंजनावाद | Kavy Me Abhivyanjanavaad
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
206
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)संस्कृत साहित्य-शास्र का परिचयन्टअभिन्यजनावाद के खरूप को निश्चित करने और उसकी समीक्षा
के पहले यह बहुत आवश्यक प्रतीत होता है कि सक्षिस रूप से सरकृत
साहित्य-गाख्र का परिचेय दिया जाय । इससे यह पता
चलेगा कि सस्रत में साहित्य-गास्र के कितने सिद्धात हैं
ओर उनसे अमिन्यजनाबाद की कितनी समता या विषमता है ।
अमिन्यजनावाद पश्चिमीय साहिव्य-जगत् की उपज है, किसी
भारतीय साहित्य-शास्त्र के सिद्धात से इसका पूरा-पूरा मेल नहीं है ।
ध्वनि और बक्रोक्ति से इसकी थोडी-सी समता है, कितु यह
समता स्वतत्न रूप से आई है। भारतीय शादित्य-शाख के सिद्धात
बहुत पुराने हैं ओर यूरोप के साहित्य का अभिव्यजनावाद अभी
कल की बात है । भाव-प्रकागन की शेखी ओर क्षमता, प्रत्येक देश
या जाति की क्या, हरएक व्यक्ति की मिन्न-मिन्न होती है । यूरोपीय
अभिव्यजनावाद की जो छाया हिन्दी काव्य-जगतू पर पडी है वह
सर्वथा विश्युद्ध नहीं | उस पर भारतीय साहित्य का सस्कार वर्चमान
है । रस ओर अलकार का जितना सूक्ष्म निरीक्षण हमारे साहित्य
में है उतना यूरोपीय साहित्य मे कहाँ मिलता है| भारतीय दृष्टिकोण
से अभिव्यजनावाद की समीक्षा के लिए यहाँ के साहित्य-सिद्धातो का
परिचय आवश्यक समझ पड़ता है ।प्राक्थन
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