समस्त जिन शासन | Samast Jin Shasan
श्रेणी : जैन धर्म / Jain Dharm

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[१५ ]सर्वे जिनशासनकी देखता (--अनुभवता ) है,--जो जिनशासन
वाद्य द्रव्यश्चुत तथा आभ्येतर ज्ञानरूप भावश्वतचाल्य है|?उक्तं गाथासे यह् स्पष्ट दोता है कि, ˆ समस्त जिनशासन ?
द्रज्य-भाव श्रुतज्ञानरुप है। तत्त्वतः भावश्चतक्ञान सम्यग्टष्टकिं ही
होता है। सम्यग्दष्टि जीव अपने आत्माको द्रव्यकर्म-भावकर्म-नौकर्म
रहित, शुद्ध, सामान्य. एकरूप अनुभवता है। और जिसे भावश्रुतज्ञान
है उसका ही द्रव्यश्चुतन्ञान समीचीन होता है, ओर उसके विकल्पात्मक-
ज्ञानको ही द्रव्यश्च॒त कदा जाता है। भाव और द्रव्य--दोनों
मोक्षमागमें सापेक्ष हैं। जेसे कि जिनमें भावलिंग है उन्दीके ही
वाह्य त्यागको द्रव्यल्िगक्री सेज्ञा मिलती है; परन्तु अन्य त्यागीको
नदीं । उसी प्रकार निर्विकल्प भावश्ुतरूप स्वानुभवीके सबविकल्पज्ञानको
ही द्रव्यश्चत संज्ञा. मिट सकती दै; अन्य ज्ञानको नहीं|.सम्यग्टष्टि जीव ( द्रन्यदष्टिसे ) अपने आत्माको परिपूर्णं च
शुद्ध मानता है तथा उसे ही (पर्यायद्ष्टिमें ) सर्वस्वरूपसे उपादेय
जानता है ।--ऐसा ‹ सम्यक् दृष्टिकोण › दी समस्त द्रव्यश्चुतका केन्द्र
स्थान है! उसे इस प्रकार वह् स्यात् पदसे समीचीन समझता है
अर्थात् ग्रहण करता है 1सम्यग्टृष्टिको अपने .अनन्त चतुष्टय मण्डित शुद्धात्माका जो
अतीन्द्रिय सहज प्रत्यक्ष स्वानुभव वर्तता है, वही ‹ भावश्चुतज्ञान 5
है। उसते इस ही अनुभवज्ञानकी जातिसे पूर्ण ज्ञानकी जातिको
पहचाना है, अर्थात् उसको केघल्ज्ञानहप स्वभावके अवलम्बनसे
भावशुतज्ञान प्रस्कुटित हुआ है 1उपयुक्त कारणवश्च उद्धृत गाथामें आचारयभगवन्तने अभेदनयसे
स्वानुभव विभूषित धर्मोत्माको ' समस्त जिनशासन ? कहा है। और
ऐसी वस्तुस्थिति होनेसे ही धमोत्माकी उक्त यथार्थ विशिष्टता दर्शाययी
है। क्योंकि “ भाव जिनशासन ? तो जिनस्॒रूप निजपदकी आराधना
-साधनाके आभावरूप है; और ऐसे भावके धारक सोक्षमार्गमें विचरते
धमौत्मा होते है 1 इसीलिए मोक्षमार्मीं धमौत्मा खयं ही द्रव्य-
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