मन के बंधन | Man Ke Bandhan

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Man Ke Bandhan by रमेश - Ramesh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१२ | मन के बंधन फ़िलिप धीरे-धीरे नीचे गया । कमरे का दरवाजा खुला था | मिस्टर कैरी कमरे में नहीं थे । फ़िलिप धीरे-धीरे कमरे मे टहलने लगा। उसे मालूम था कि कौन सी चीजें उसकी माँ की हैं और कौन सी मकान मालिक की । तब एक घड़ी पर उसकी दृष्टि थम गई, जो, उसको माँ ने कभी कहा था, माँ को बहुत पसन्द थी | उसे लेकर वह कुछ असन्तोपके साथ ऊपर गया । अपनी माँ के सोने के कमरे के सामने खड़ा होकर वह सुनने लगा | यद्यपि किसी ने उसे भीतर जाने को मना नहीं किया था । उसे महसूस होता था कि एेसा करना गलती हीगी । वह्‌ जरा डरा हुआ था, और उसका दिल साधारण से ज्यादा गति से धड़कने लगा था। लेकिन साथ-साथ कोई उसे दरवाजा खोलने को प्रेरित कर रहा था। उसने हेंडिल बहुत धीमे से घुमाया, जैसे भीतर किसी को कोई श्रावाजन सुनने देना चाहता हो और बड़े धीमे से दरवाजा खोल दिया | कुछ देर वह देहली. पर खड़ा रहा, तब अंदर प्रवेशं करने का साहस कर राकरा। अब वह डरा हुआ नहीं था, बस एक अ्रजीब सा भाव मन में उठ रहा था । उसने अपने पीछे द्वार बन्द कर लिया | परदे खिंचे हुए थे और जनवरी की दोपहर की ठंडी रोशनी में कमरे में अ्रंघेरा था। श्रमार-मज पर मिसेज़ कैरी के ब्रश श्रौर हाथ शीशा रखे थे। एक छोटी सी दे में बालों के पिन थे-चिकनी-पीस पर एक उसका भौर एक उसके पिता के फोटोग्राफ रवखेथे। जव उसकी मां जीवित थीं, वह पिता व अक्सर इस' कमरे में आया करता था, पर ग्र बड़ा श्रन्तर महसुस हो रहा था, कुसियाँ कुछ अजीब तरह की दिखलाई पड़ने लगी थीं । बिस्तर _बिछा हुआ था जेसे रात में कोई उस पर सोयेगा श्रौर तकिये पर एक केस में रात की पोशाक रबखी थी । द ... फ़िलिप ने कपड़ों की एक बड़ी श्रालमारी खोली श्रौर अंदर प्रवेश करके जितने कपड़े दोनों हाथों में ले सकता था लेकर उनमें अपना सिर गड़ा दिया । उनसे उस इत्र की खुशबू आरही थी, जिसे उसकी माँ इस्से- माल किया करती थी । तब उसने माँ की चीजों “से भरे दराज खोल




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