जीवन चरित्र का प्रथम भाग | Jivan Charitraka Bhag-1

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Jivan Charitraka Bhag-1 by दयालचन्द्र - Dayalchandraपन्नालाल - Pannalal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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€ की कि यदि বছ पुस्तक दछिन्दी में लिखा कर छपवाया जाये तो विशेषतया सिं के किये बहुत उपयोगी होगा, क्योंकि खियें उर्दू आचा का पटना कम जानती हैं और इसके अतिरिक्त यह भी सार्थक है कि उ्दू भाषा तो प्राय पञ्चाव्र भान्त में ही प्रचलित है परन्तु मारवाड, मेवाड, मालवा, दक्षिण आदि प्रान्तों में थहुत कमै किन्तु हिन्दी के पठित अधिकतर हैं इस च्य लाला द्यालचन्द् ने इस पुस्तक का हिन्दी में अनु याद कराया और छपाने को तैयार थे इतनेमें बाई चैरागन जो कि, रियासत्त पटिआला निवासी ऊाछा रामशरण जी ओसब्राल (मावडा) की पुत्री, छाला रोशनलाल की भगिनी (बहन) ओर जिला छुद्ठिदह्ाना नगर रायकीट नियासी छा० रलदुमल्ल की पुत्रयधू बाल प्रिधया बाई पार्वती श्रमणो पासिका जो चिरक्काल से লল दीक्षा धारण करने के भाप रखती थी अस्तु जैनाचार्य्या श्रो १००८ श्रीमद्दासतो पार्वतीजी मद्ाराज की रिष्याश्नी १०८ श्री सजमतीजी महाराज की सेवा मं स० १६७६ चिर में नगर जारूघर में दीक्षा धारण करने के लिये उपस्थित हुई और ভাও दयाऊरूचन्द चुकसेलर (पुस्तका वे) से कहा कि आप सैनाचा््या श्ची १००८ श्री मद्यासती पार्वती जी महाराज का जीवन चरित्र हिन्दी मे छपवार्दे तों वडा उपकार होगा मीर उसमें जितना ठब्य व्यय (खर्च छोगा वह सब में अपने पाससे देना खीकार करती है, तब ला० दयारूचन्द जोने वडे उत्साह से घधर्मोपकार जान कर प्रि* स० १६७६ में श्री मक्धगयान मद्ायीर २४४६ में छपाना आरम्भ करः दिथा, भल्तु यद सव उपकार तो चैरागन प्राई पार्बती जी का है कि जिन्दोंने १००० (एक सद) रुपया इस पुस्तक के छपाने को दान क्रिया मीर नगर जादधर में उदार चित से अपने दोक्षा महोत्सव पर तथा द्‌ानमानादि मै ४ दजार रपया खर्व करके स १६५६ के सुगशिर शुदी १५ सोमयार शुम मुष्टत में सब साखारिक सुख धन पदार्थ आदिकों को त्याग कर जैनयोग धघृचि (दीक्षा) घारण को । परन्तु इस पुस्तक रूए रपसा स्ुल्य इस लिये स्व दिया गया है कि यदि पिना मट्य यह पुस्तक चाया जायगा तौ रेने वाले शायद्‌ पठन करें अथवा न करें परन्तु यदि मृटय दे फर लेंगे तो ख्या रहेगा फि हमने एक पुस्तक खरीदा है एक यार पढ़ कर तो देखे कि इसमें क्या कथनहे परन्तु इसके मूल्य का जो द्रव्य प्राप्त, 1५




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