गीली आँखें गीले गीत | Gilee Aankhen Gile Git

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Gilee Aankhen Gile Git by शिवशंकर वशिष्ठ - Shivshankar Vashisht

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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छवि का अंजन तेरी छवि का मरकर अंजन नयन लुटाते अपना घन ! - लेने ओ! देने से ऊपर पहुँच चुका है अपनापन चेतन ओर अचेतन मिलकर, पिछली भूल सुधार रहे; साँसों के नाविक जीवन की, नेया को कर पार रहे; केशां ने रजनी के तम को, धोकर पावन कर डला; तेरे इक इंगित परं रीते, अम्बर का घट भर डाला; तेरी मुरली धड़कन बनकर, मुझे जगाती जाती हे; पल्लव हिलते दह अर्चन के, माव कर रहे आराधन। तेरी छवि का भरकर अंजन नयन लुटाते अपना घन ! लेने ओः देने से ऊपर पहुँच चुका है अपनापन ! धीरे-धीरे भीड़ जमा हो-- ती जाती है. द्वरे पर; पलकों के चिक उठा न पाये, जोर शोर सब हारे कर; ( ११ )




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