बजात आवे ढोल एक लोकगीत अध्ययन | Bajat Ave Dhol Ek Lokgeet Adhyayan

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Bajat Ave Dhol Ek Lokgeet Adhyayan by देवेन्द्र सत्यार्थी - Devendra Satyarthi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आमुख र समध्याओं का समाधान हो जाता है या जो उतने तीघ रूप में नहीं रहतों उनका स्थान लोडगीतों में कोई श्रन्य बसु ले लेती है | दसडे उद्ाहरणों की कमी नहीं है। श्रमेरित्रा में कल-कारखानों की नई लोजवार्ता पैदा हुईं | हमारे यहाँ मी जहाँ पदले पति छो फुसला कर ले जाने वाली ধীর? ही होती यी वर्श प्रण चल कर वद कां 'रेल! पर आरोवित हो गया | 'रेलिया होह गई मोर सृतिया, दिया के लाडि लइ गई हो !? 'मुगल्' का राज 'फिरंगी! का बना, निष्छुर जवानी तक की उपमा अंग्रेज के राज से दी गई, कितने द्वी लोकगीत राधीय थ्रानदोलन के मय “गांधी बाग? के नाम पर दाल दिये गये, इत्यादि । बन-परग्परा थ्रागे ही इदती है, पीछे हटती नहीं। विन धरना का उसके लिए कोई अर्थ या वर्तमान मूल्य नहीं रद्द जाता, वह तत्व छुट जाता है । इस परिचार से यह कइना गलत होगा कि बन-परसरा के समी तल अमर ई, क्योंकि ऐसे दृष्टिकोण से हम जन-परमरा के गत्रिमय रूप से आँखें बन्द करते हुए. केपल उठड्डे ध्राचीनल को दी प्रतिब्य्त करते जाने के दीपी होंगे, श्रीर ज्ञात श्रयत्रा श्रद्यत रूप छे उन प्रतिगामी त्लों के मी पोपह़ होंगे जिन्हें जनता श्रनजाने छोड़ती जाती है | जो लोग ऐसे शब्दों का अयोग करडे कहते हैं कि लोड- परम्परा एक रूप से चलती बाती है,बढ श्रमर है, वइ देशगत सोमाग्रों का उल्तंयत इसलिए कर जाती है कि জী धरती मानव्र का छूदय है और उसका खेत सारी दुनियाँ है? ( पलोरेंस बादसफोई ; फोर सौग द्मा मैनी पोफ्छ--खं २) एकांमी रात कते ४1 ४ यह मानता हि लोक-परम्पया चलतो चलो জারী ই, ঘং বহ ঈন चलती दी नहीं, विकष्ित हो फर श्रग्रमर होती, बद देशगत सीमा फा उलन मी इवक्िर कर वाती टै छि मानवी सामाजिक समस्याएं और मूल मावनाएं अब ठक अधिकांश रूप में एक-सी रही हैं; वह श्रम्‌ दख श्रं में नहीं कि वह प्राचीन को साथ लिये चली थ्ाातो है बहिक इसलिए कि प्राचौन उुसमें पुराने हल छोड़कर नए. तस्य अंगीकृत करझे नया बन जाता है । लोक-साद्ित्य का इधी ऐतिहासिक- सामाजिऊ दृष्टि से श्रष्ययत द्ोगा चाहिए, कि उम्र्मे विशिष्ट समाज या सामामिइ-अ्रसस्या के सुख- दुख फल्लन-उलीडन किस अ्रंश में प्राप्त दोते | तमी समय विशेष में बन-जीयन की श्विति ओर उसकी मानसिक प्रतिक्रियाओं झा वेशनिक रफ्ट्ीकरण समय हो सकता है । लोडमौतों का उचित संग्रदीकरण, अ्ष्ययन, विश्लेष्ण, संप्दण श्रौर श्रंगीकरण इसी सम्पूर्ण सामाडिऊ दृष्टि से होता चादिए जिसकी लोडगातों के श्रष्येता या संग्रइर्ताशं से श्राज तक शपेत ই। यद्‌ परिवार सामने रफें तो स्पष्ट दो झायगा हि लोडगीतों पर ढार्य झिने दिशाओं मेँ. और पि प्रकार सिया जाय | संग्रद्दीइरण में परिमाणगत थौर गुणगत प्रशनों दो ध्यान में रखने हुए, झिन बातों पर विशेष महत्व दिया बाप, जिसे एक श्रोर तो इम लोडगीौतों डे श्रेष्ठ दलों द्वारा बला, दल, धगीवादि दौ ता रि दे सट श्री! उन्हें दन-डीवन डे किझ्ट ला सकें तथा , दूषी श्रोर एेतिदाणिद शरोर सामाडिऊ सम. ध्राप्त करडे लोड-दीवन डे ग्राज तक न लिखें गये सही इतिद्वास को नींव डाल सऊ। लोसवार्ता ढे हिन ठ्ी हा ভন হী विश्लैपण श्राव्य है ये मेरे दिचार से पहले तो दीवन दे श्रागनट श्र चैन डे पढ़ हैं, दामाडिझ और ऐतिदासिड पठ, दातीयना-ररीयता श्न प्त, रीति-न्विर, टच, पठ, सन्य, दीद्या, ब्भ कला-पछ, लोडगीठों में दृत्क-टेंगीव डे বল) লহ सदये चराणि तोप दिश्येर मृत गिरी ˆ बाना নাহিহ | ছুলণ গীত সম বা গ্বনিতেরে न्य, द्था-चिदन्ठी, य इ की




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