मूलरामायण | Mularamayan

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Mularamayan by पाण्डेय श्री रामनारायण दत्त जी शास्त्री - pandey shri ramnarayan dutt ji shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ १० ] प्रविद्य तु महारण्यं रामो राजीवलोचनः । विराधं॑ राक्षस॑ हत्वा शरभड्“ं ददशे ह॥४१॥ सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च अगस्त्यभ्रातरं तथा । उस महान्‌ वनमे पर्डचनेपर कमरुरोचन रामने विराघ नामक राप्तसक्रो मारकर शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य सुनि तथा अगस्त्यके श्राताका दर्शन किया । अगस्त्यवचनाचैव जग्राहैन्द्रं शरासनम्‌ ॥४२॥ खङ्गं च परमप्रीतस्तृणी चाक्षयसायकौ । फिर अगस्त्य मुनिके कहनेसे उन्होंने एेन्द्र धनुष, एक खञ्च ओर दो तूणीर, जिनमें बाण कमी नहो घटते ये, प्रसनतापूर्वक ग्रहण किये । वसतस्तस्य रामस्य वने वनचरैः सह ॥४३॥ ऋषयोऽम्यागमन्सर्वे वधायासुररक्षसाम्‌ । एक दिन वनमें वनचरोंके साथ रहनेवाले रामके पास असुर तथा राक्षसोंके बधके लिये निवेदन करनेको वहाँ के सभी ऋषि आये। स तेषां प्रतिशुशञ्राव राक्षसानां तदा बने ॥४४॥ ग्रतिज्ञातश्च रामेण वधः संयति रक्षसाम्‌ । ऋषीणामभ्रिकल्यानां दण्डकारण्यवासिनाम्‌ ।४५॥ उस समय रामने दण्डकारण्यवासी अश्चिके समान तेजसी उन ऋषिर्योको राक्षसोके मारनेका वचन दिया ओर सङप्राममे उनके वधकी प्रतिज्ञा की |




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