नव पदाथ | Nav Padath

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Nav Padath by आचार्य भीखणजी - Acharya Bhikhanji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[६]. बन्च-हेतु (गा० २७-२८); उच्च गोत्र और नीच गोत्र कर्म के बन्ध-हेतु (गा० २६ ०) ज्ञानावरणीय आदि चार पाप कम (गा० ३१) वेदनीय आदि चार पुण्य कर्मों की करती निरवद्य है (गा० ३२); मगवती ८.९ का उल्लेख दृष्टन्य (गा० २३) कल्याणकारी क्म-बन्ध के दस बोल निरवद्य हैं (गा० ३४-३७); नौ पुण्य (गा० ३८); पुण्य के नवों बोल निरवध व जिन-आज्ञा में हैं (गा० २३६); नवों बोल क्या अपेक्षा रहित टै ? (गा० ४०-४४); समुद्य बोल अपेक्षा रहित नहीं (गा० ४५- ५४); नौ बोलो की समम (गा० ४८-५४); सावद्य करनी से पाप का बन्ध होता है (गा० ५५-५८); पुण्य और निर्जरा की करनी एक है गा० ५६); पुण्य की ६ प्रकार से उत्पत्ति ४२ प्रकार से भोग (गा० ६०); पुण्य अवाउछनीय मोक्ष ; वाउछ नीय (गा० ६१-६३), रचना-स्थान और काल (गा० ६४) 1 टिप्पणियाँ [ १--पुण्य के हेतु गौर पुण्य का भोग पृ २००; २--पुण्य की करनी में निर्जरा ओर जिन-आज्ञ कौ नियमा प° २०१; ३- साधु के सिवा दूसरों को अच्नादि देने से तीर्थकर पुण्य प्रकृति का बंध होता है इसत प्रतिपादन की अयी- क्तिता पृ० २०२; ४-पुण्य-वेध के हेतु गौर उ्तकी प्रक्रिया पृ० २०३-- पुण्य जुम-योग से उत्पन्न होता है: शुभ योग से निजंरा होती है और पुण्य सहज रूप से उत्पन्न होता है जहाँ पुण्य होगा वहाँ निजंरा अवध्य होगी : सावद्य करनी से पुण्य नहीं होता : पृण्य की करनी में जिन आज्ञा है, ५--अशुभ अल्पायुष्य और शुभ दीर्घायुप्य के बन्ब-हेतु पृ० २०६; ६--अशुभ-शुभ दीर्घायुष्य कमं के बन्ध-हेतु पृ० २१०; ७--अशुभ-शुभ आयुध्य कम्र का बंध ओर भगवती सूत्र पृ० २११ ८- वंदना पे निजरा भौर पुण्य दोनों प° २१९१; ₹- মক্কা উ निर्जरा ओर पुण्य दोनों प २१२; १०--वेयावृत्य से निजरा ओर पुण्य दोनों प° २१३; ११- तीथकर नाम कमं के নন ० २१३; १२ निरवद्य सुपात्र दान ते मनुष्य-आयुध्य का बंध पृ० २१६; १३--साता-असाता वेदनीयक्मं के बंब-हेतु पृ० २२०; १४--ऋर्कश-अकर्कश वेदनीय कम के बंध-हेतु प० २२२; १४-- ल्याणकारी-कल्याणकारी कर्मो के बंघ-हेतु प २२२; १६--साता-असाता वेद नीय कर्म के बंध-हेतु विषयक अन्य पाठ प्ृ० २२४; १७--नरकायुष्य के बंध-हेतु पृ० २२४; १८--तियंठचायुष्य के बंब-हेतु २२४४ १६--मनुष्यायुष्य के बन्च-हेत पृ० २२५; २०--दैवायुष्य के बंध-हेतु पृ० २२६; २१--शुभ-अशुभ নাল হদ ঈ बंब-हेत १० २२७ २२--उच्च-नीच गोत्र के बंध-हेतु पृ० २२८; २३--ज्ञाना वरणीय आदि चार पाप कर्मो के बन्ध-हेतु १०२२६; २४-वेदनीय आदि पुण्य




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