क्षुधित पाषाण | Kshudhit Pashan

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Book Image : क्षुधित पाषाण  - Kshudhit Pashan
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सम्ताचार-पत्र पढ़कर एवं मुबलाई खाता खाकर एक छोटे से कोने वाले घर में दीपक बुफाकर बिछीने पर जाकर शयन किया । मेरे सामने वाले खुले जंगले के भीतर-से, अ्रन्धकार से पूर्ण अरावली দলীল লী चोटी से एक्र ग्रत्यन्त उज्ज्वल नक्षत्र सहख्रक्रोटि योजन दूर झ्राकाश से, उस बहुत छोटी कीम्प-लाट के ऊपर श्रीयुक्त महसूल-कलक्छर को टकटकी बाँधकर निरीक्षण करते हुए देख रहा था--इससे में विस्मय और कौतुक का अनुभव करता-क्रता किस समय सो गया--नहीं कह पकता । सहसा एक समय विहर कर जग उठा--घर म कोई शब्द हूप्रा हो, ठेना नहीं था, किसी आदमी ने प्रवेश किया हो--वह भी देखने को नहीं मिला | अधेरे पवत के ऊपर से निर्निमेष नक्षत्र अस्तप्रायश हो गया था एवं कृष्णपक्ष का क्षीण-चन्द्रालोक ८ प्रकाश ) अ्रनधिकार-संकुचित- सलानभाव से मेरी खिड़की के मार्ग द्वारा प्रवेश कर रहा था ।किसी आदमी को नहीं देख पाया। तो भी जैसे मेरे मन को स्पष्ट लगा, कोद एकर व्यक्ति मुझे घौरे धीरे ठेलरहा है । मेरे जग उठते ही बह कोई बात न-कह कर केबल जैसे अपनी अंग्रूठियों से चमकती हुई पाँच उद्धलियों के इशारे से अत्यन्त सावधानी पूर्वक अपने पौछे-पीछे भ्राने का प्रदिश कर उठा ।पँ बहुत दुषचप उठा । यद्यपि उस्र शतकक्षप्रकोष्टमय ( सैकड़ों कमरों वाले ) प्रकाण्ड शून्यतामय, निद्वित ध्वत्ति एवं सजग प्रतिध्वतिमय विद्याल प्रासाद में घुभे छोड़कर भर कोई भी श्रादमी नहीं था, तो भी पम-पग पर भय होने लगा--कहीं कोई जग न जाय । महल के अधिकांश कमरे बन्द थे एवं उन सब घरों में में कभी नहीं जाता था ।उस रक्त मे निःशब्द रपति रखते हुए तथा सासि सापे उस श्रहदय आह्वान रूपिणी का अनुसरण करता हुप्रा में कहाँ होता हुप्रा कहाँ जा रहा था--आराज उसे स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता । कितने संकीणं प्रैधेरे मागं, कितने बडे बरामद, कितने निस्तन्य अत्यन्त विशाल सभा६




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