संतोष कहाँ ? | Santosh Kahan ?

Santosh Kahan ? by अज्ञात - Unknown

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
संतोष कहाँ! | मचत्ताराम- ( एक कुर्सी पर बैठते हुए ) अच्छा, तो फिर बैठो । [ रमा चुपचाप बैठ जाती है। कुछ देर निस्तब्धता रहती है। ] मनसाराम-- ( रमा की ओर देखते हए ) क्यों स्मा ! विवाह के पश्चात्‌ आज तक मेरा तुमसे इतना कम बोलना, दिनरात पुस्तको में ही गड़ा रहना तुम्हे कभी नही अखरा ! रमा-- ( कुछ देर सोचते रहने के बाद ) आपके पास अधिक से अविक रहने की इच्छा रहते हुए भी आपके साथ ज्यादा से ज्यादा बातचीत करने की अमिलापा रखते हुए भी आपका मितभापी रहना, या सदा पुस्तकों का अवलोकन करते रहना, सुझे अखरता नहीं है। (कुछ रुककर) अगर अखरे तो आप पर क्रोध आना चाहिये, वह आज तक कभी नहीं आया | मचसारास--- ओर घर का यह आर्थिक कष्ट कभी गेहूँ नहीं है तों कमी चावल नहीं, कभी घी नही है, तो कभी शक्कर नहीं, कभी कपडे ही नहीं है ओर कभी और कुछ नहीं, इससे तुम्हे दुख नहीं पहुँचता ! रमा-- ( दुछ देर सोचने के पश्चात्‌ ) दुख ! नहीं, दुख तो कभी { १३




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now