आधुनिक हिंदी - साहित्य का इतिहास | Aadhunik Hindi-sahitya Ka Itihas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पूर्वपीठिका कै ५ भाषा सें खड़ी बोली, अझवधी तथा न्रज-साषा तीनों का योग पाया जाता है। 'लागरीप्रचारिणी-ससा ' काशी” द्वारा प्रकाशित “कबीर-प्रंथावली” की भाषा पर पंजाबी बोलो का थी प्रभाव पढ़ा है । इन कवियों की सीापा ' “साहित्यिक नहीं होती थी । इनका लद्य काव्य-रचना नहीं था; जनता में झपने घर्म का प्रचार करना था । ऐसी श्वस्था में इनके लिए यह अनिवायं थी कि ये लोक में प्रचलित भाषा में ही अपने उपदेश दें । विस्तृत घर्म-प्रचार को लक्ष्य में रखकर भगवान्‌ बुददेव ने भी लोकभाषा ( पाली ) का थाश्रय अहणु किया था । इन संतों में स्रे सुंदरदात की रचना साहित्य कोटि की होती थी । इनका 'सुंद॒र-विलास'” जिसमें _ कवित्त, सवेया झादि छुंदों का झधिक प्रयोग हुआ है, प्रसिद्ध है। मलकदास, अक्षरअनन्य, प्लंट्दास, तुलसीदास आदि अनेक संत कवि हुए और इन्होंने अनेक संप्रदायों की स्थापना की । यह परम्परा अभी तक चलती 'आ रही है | आजकल का 'राधास्वासी-संप्रदाय' इसी परंपरा का एक रूप है। इन संत कवियों के छ्वारा वास्तव में लोक का वहुत कुछ उपकार हुमा । निम्न श्रेणी के लोगों में छात्मविश्वास की आावना जागरित , करने का श्रेय इन्हों को प्राप्त है । परंतु अप्रत्यक्ष रूप से वर्णाश्रम घम्म को इनके द्वारा कुछ क्षति भी पहुँची । निक संत कवियों ने वैदिक धर्म के विधान को रहस्य न समक उसका खंडन करना प्रारंथ कर दिया । इससे लौकिक 'विधान के पालन में शिथिलता लगी । लोग दो चार साखियाों बनाकर अपने को परमज्ञानी सम भने - लगे । उनके अलुकरण पर और भी अनेक अकर्संण्य लोगों ने ज्ञान का चोला पहनना प्रारंभ किया । सलूकदास आदि के उपदेशों से आलसियों की संख्या भी बढ़ने लगी । आज कल भी ऐसे लोग जिनसे कुछ करते धरते नहीं बनता, उच्च स्वर सें सलूकदास का यह मंत्र जपते हुए सुनाई पढ़ते हें | _. . अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम । दास मलूका कहि गए, सबके दाता राम ॥ ये संत कवि निगुणोपासकं कहे जाते हैं । इसका कारण यही है कि लोग व्यक्त सत्ता की उपासना करते है। इनके इस विषय के




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