प्रेम में भगवान | Prem Mein Bhagavaan

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Prem Mein  Bhagavaan by जैनेन्द्र कुमार - Jainendra Kumarलियो टालस्टाय - Leo Tolstoy

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१६ प्रेम में भगवान मार्टिन मुस्कराया । बोला---“यह सच बात है | उसी ने मुझे झाज इधर देखने को कहा था। कोई यह संयोग ही नहीं है कि मैंने तुम्हें देखा 1” यह कहकर मार्टिन ने उसे अपनी सपने की बात सुनाई । बताया कि कंसे ईश्वर की वाणी हुई थी कि इंतजार करना, मैं झाऊंगा । स्त्री बोली-“कौन जने? ईश्वर क्या नहीं कर सकंता ।” वह उठी और अ्रपने बच्चे को चारों ओर से ढकते हुए चोगा कंघों पर डाल लिया । तब भ्रुककर मार्टिन को फिर एक बार धन्यवाद दिया ! “प्रभु के नाम पर--यह लो ।” माटिन ने कहा और चदरा गिरवी से छुड़ाने के लिए छः आने स्त्री के हाथ में थमा दिये । स्त्री ने ईशु प्रभु को स्मरण किया। माटिन ने प्रभु का नाम लिया और फिर उसे बाहर पहुँचा आया । स्त्री के चले जने पर माटिन ने देगची उतार कृं खाया-पिया, वासन-वस्त्र संमालकर रख दिये श्रौर फिर काम करने बैठ गया । वह बेठा रहा, बैठा रहा श्रौर काम करता रहा ¦ लेकिन खिड़की को नहीं भूला । छाया कोई खिड़की पर पड़ती कि वह तुरन्त निगाह करता कि देखू, कौन जा रहा है । उनमें कुछ जान के लोग निकले तो कुछ अनपह- चाने भी । पर कोई खास नजर नरींश्राया) थोडी देरबादएक सेव वाली स्त्रीको माटिनने ठीक श्रपनी खिडकीके सामने रुकते देखा । वह्‌ एक बडी टोकरी लिये थी ; लेकिन सेब उसमे बहुत नहीं रह गये दीखते थे । साफ था कि वह बहुत-कुछ उसमें से बेच चुकी है । उसकी कमर पर एक बोरा था जिसमें चिपटियां भरी थीं । उसे वह्‌ घर ले जा रही थी। कहीं इमारत की मदद लगी होगी, सो वहीं से बटोरकर लाई होगी । बोरा उसे चुभ आया था और एक कंधे से दूसरे पर उसे बद- लना चाहती थी । सो बोरे को उसने रास्ते के एक ओर रख दिया और टोकरी को किसी खंभे से टिका दिया। फिर बोरे की छिपटियों को हल- हलाने लगी । लेकिन तभी फटी-सी टोपी ओढ़े एक लड़का उधर दौड़ा और टोकरी से एक सेब ले भागने को हुझ्ना । पर बुढ़िया ने देख लिया और मुड़- से उसकी बांह पकड़ ली । लड़के ने बहुतेरी खींचातानी की कि




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