श्रीशम्भुगीता | Shrishambhugeeta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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রি विपयानुक्रमणिका ।. , ११ ४ = १.१५ ५ ३० क, 7; विपथ ह पृष्ठाह्ु (^ ४ ' वृताय अध्याय | चक्रपीठशुरिनिरूपण : कि ४६-६६ सदारिषक्षी आज्ञा | ' (१) चिज्जडग्रन्धिकी सहायतासे जीशॉका उत्पत्त दोकर ८६ सास्र योनियं भ्रपणपून्वंक्र आर्यभावको प्राप्त होना, चतुर्विध भूवसद्तकी यत्तका सारल्यं ओर प्रत्येक जीषवगेके रक तथा एक योनिसे दूरी योनिम पहुंचाने- याले देवताओंका होना, पितरोंकी सहायता मदुषयोकां पाना और उससे आय्येकोटिमं पहुंचना, भारय्यकरोरिये शुद्ध चक्र ओर शुद्ध पीठकी सहायताले खायुज्य प्राप्त करना थरौर जीवत्यका नाश करनो, आवागमन चक्रकी कई परिधिय, गुणभेदलसे आवागमनचक्रके भेद, चक्रके शुद्धलत््यप्रधान होने पर भगवोनम॑ लय होना, लयके समयक्री सहज और शुक्तनास्ती दो अ्रवस्था, इस चक्रके भेदनमे शानीभक्तका अधिकार, परिधियोम जीवको पहुंचानेमे देवताओफी अधि. कारिता, शुक्ष कृष्ण और सहंज्ञनाम्ती विविध मतियां ओर इनकी अवान्तर गतियां, सहजगतिसे जीघस्प्ुक्ति, जीव- ` न्मु स्थिति भौर श्रन्त, जीवन्मुक्तौके आवागमनचकूका सृत्युल्ञोकरम और शुक्कगतिसे जानेधालोके आवागमनचकूका सूथ्यप्एडलभेदनके समय शान्त होना, जीवक लिये पिएडकी आषश्यकता मा নি ४६-५२ (२) सहम मानव और देवरूप त्रिधिध पिएड श्रौर उनके लक्षण, उनका पांचभौतिकत्व, संहजमे पार्थिव प्राधान्य, दैवमे श्रलौकिक शक्ति और मानवमे शक्तिविशेषके श्राक्षरकौ उपयोगिता ओर शीसे उल्का चतुवेगेपल प्रदत्व और प्रधानत्व, निःश्रेयसका लक्षण, मानवपिण्डक्ी मुख्यतामं पितरोंका कारणत्य, पितरोंकी इसकी स्मरण




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