विचार स्वरुप स्थिति | Vichar Swarup Sthiti

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
194
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)स्वरूपं स्थिति ] [ ওईश्वर श्रभिमुख, तुम विवेक को श्रपते ही, दर दो ।
मत-पतान्तरों के सन्मुख, उसकी स्वतन्त्रता कर दो ॥वह ॒ प्रकाश भनिर्बेल नियमों को नहीं ठहरमे देवा ।
पुरनाथ सत्यथ पाकर फिर शरण उसी की लेगा 11२८॥।
साधन विरति विवेक आदियुत पथ पर हो यदि चलना ।
सुतो शोक तज शान्त चित्त से बेंठ, हमारा कहना ॥।
माननीय दुमको मम वाणी सहित युक्ति शुति अनुभव ।
फिर भौ निघा स्वच्छन्दत पुः्णनाय লঙ্ললি নল 11২২1)
है सुगढ़तम यह হইত जीवन का सुलभाने को |
बिनु प्रभु कृपा न सरल, समझते श्रो समझाने को ।।
आवश्यक सुझको हृष्डान्तों का आालम्बन लेता ।
तुमको पुरणनाथ सुक्ष्म मति, ध्यान घेर्णेशुल देना 11३०॥।
रमसे जगत प्रतीत, ज्ञात से तीच काल में सिथ्या |
किन्तु निरूपश क्रम भी, श्रुति में हित सुम्ुक्षु को शिक्षा ।।
গুলি सिद्धान्त उसय, भ्रम समझे यदि उत्कट जिज्ञासा ।
पूर्णनाथ सिटती है, ऋ्रम से मन्द सुसुक्षु पिपासा ॥1३१।
श्रात्मा से सम्भुत गगन फिर वायु तेज जल धरती ।
एकोऽहम् बहुस्याम् सृष्टि से पूर्व फुरश ईश्वर करी ।।
ईश्वर के संकल्प मात्र से जगत दृश्य सज आया ।
एरेना लो इसे समस, फिर फुरना লীহী साया ।\३२।।
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