हिंदी के एतिहासिक उपन्यासों में वर्ग संगर्ष | Hindi Ke Yetihasik Upanyason Mein Varg Sanghrsh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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तिहासिक उपन्यासों में वर्ग-सधर्ष २१ 2.समय अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर पहुच गया था--“लाल वुःवरसिह की मवजात्त वन्या की पहली बुआ-कुआ वरते ही दाई ने उसके मुख मे मदार के पत्ते का दूध टपकाना आरम्भ कर दिया था। दाई ने बच्ची को मदार का दुध पिलाकर उसके मुख म गर्भ का मल भर दिया 1 जच्चा वी खाट के पास गडूढा खोदकर जैसे तैसे शिशु का शव तोप दिया और भागने को तैयारी म लगी । इस जमीदार-नगें के मनुष्यों का स्वभाव ऐश्वर्यमय बन गया था-- यह जमी- दार अपने ऐश्वर्य से सतुष्ट नहीं था । तृष्णा के प्रभाव से उमन अमानुपिव कार्य करने आरम्भ कर दिए थे । शरावी और व्यभिचारी होदा कम दुर्गुण नही है, पर इसने गरीबों को लूटना और भूखो मारना प्रारम्भ कर दिया था। इसवाजीवन हजारों मृत्यु के वराबर था ।”' जमीदार के इस शोषण में सहायक समस्त सामस्त-बर्ग था ।सामन्त-वगंराजा नापकसिह (विराट की पद्मिनी) तथा जनार्देन शमां सामन्त-वगे के प्रतिनिधि हैँ । “राजा नायकसिह विलासी, सनकी ओौर्‌ उदार दै । सामन्त-वभे वी समस्त दुवलताए मवलताए उसमे है । देवीरिह मे सामन्तीय कुचक्र तो है परन्तु वीरता तथा उदारता भी दै । उसक्रा सम्पूणं चरित्र आदरका पान नही । जनादन शर्मा धूते मौर चालवाज दै । सामन्तीय दाव-पेचो से, धूता गौर चालवाजी से उसका चरित्र पूर्ण है ।” अपने इसी व्यवहार द्वारा गरीब जनता के शोपण की निरन्तरता ने समाज में वर्ग सघर्ष की परिस्थितिया उत्पन्न कर दी । सामन्त- वर्ग वे अत्याचार का वर्णन 'चीवर' भ मिलता है, मित्तकाली कहती है--/मुझे सामन्त देवक ने विवह्‌ के वाद पकडवाक्र मरी सुहागरात को ही बूलवा लिया था। मरा पत्ति छाते बनाता था । उसस न देखा गया तो वह विरक्त हो भिक्षु हो गया ।' * “ठकु राणी” उपन्यास में अनूपसिह सामस्त-वर्ग का है--“उस्त अनूप- सिह की बात ही मत पूछो । वह केसर के नाम से चिढता है! दिनमर शराव के नशे में चूर वह हमारी बहु-बेटियो क्री इज्जत से खेलता है ।”* छोटी-छोटी बॉलिकाओं पर अपनी वासनात्मक हवस मिटाने के लिए निरन्तर अत्याचार करता है । आज भी यदा-ऊुदा ऐसे छूटपुट अत्याचार होते है, किन्तु लोगो को सामस्ती मनोवृत्ति अभी तक नही बदली है। फलन समाज म सर्वत्र वर्गे-सघर्षशतपरज के मोहरे--अप्ृतलाल नागर, पृ० १२६पतन--भगवतोचरण वर्मा पु० & दू-दावनताल वर्मा --आचाय बटुक, पु० छ४» चौदर--राग्रेय राघव, पृ० श१ टकुराणो--यात्वेद्र शर्मा चन्द्र, पृ० १६१न + ५ ~दि




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