सुरभारती - सन्देश | Sur Bharti-sandesh
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
214
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[ र३ এसन्देशेपु पुनमयाऽपि फतिचिद् भाया निजा योजितापुष्ण्य स्वनिभवेन चेदूं, अनुचित ज्ञेय न वि्ठञ्जने ।
य स देशितुराशय सुपिपुलैयोचा विज्ञासर्निजेसुस्फीत कुरुते स एव कुशल सददेशवाहों मत 11২8,
देशेपूत्तरदत्तिणेप सुचिरादाहिए्शता নবীपिद्ृद्धि सह सद्नतीयिंद्धता विद्यालयान् पश्यता ।
यजज्ञाते खलु साध्वसाधु सकल वृत्त तदावेदितसत्य सस्क्ृत-सस्कृतज्ञनिवुधश्रयोधिया केवलम् ॥१५॥
दूत कश्चन विप्रिया अप गिर सन्देशभूता वदन्नीतिशैस्लुगन्यते न च॒ पुनदुर्बाच्यता गन्छति।
तन्मन्येऽयमपि प्रसन्नमनसा सन्देणदारी जनोविद्वि सदसद्धिवेककुशलमंरपिप्यते स्ववा ॥६
प्रान्ते च पुनर्मिव.धमसिल रप्टया पिया स्वस्थयास्माभिप्रायनिषेदनाव सुधिय सर्वे मया सादरम ।
येनाय परिमार्जित प्रगुणितो भूयात् सदा सख्छत्त-चेत्र निम॑लसार्गदर्शकमदहादीपप्रकाशोपम ॥१५আম শাম पुनरहमित शीघ्रमेवाविरामग्रामे পান सकलगरिटुपा पादमूलोपविष्ट ।
बाणीमेतामनुदिनमनुप्राणिनी श्रावयिष्येविद्वद्दर्गों मुहुरपि यथा वन्य॑ता यादु ल्लोके ॥९८॥
मन्ये सर्वे स्पपरगणना-सान-मात्सर्यदोपै--रस्पष्टान्न करणसुभगा. सद्गुणग्राहिएश्र ।
विदृद्ययों. सरस-करुणा-स्नेह-सोहारद - पूरे-दू रे दूरेषप्यसमसमये मत्सहाया भवेयु' ॥ 6
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