नलचम्पू: | Nalchampooh

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Nalchampooh by कैलासपति त्रिपाठी - Kailaspati Tripathi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १६ ) दक्षिण दिल्वा के मुख का तिलक कहता है । वहाँ के श्रीपवंत, कावेरीतीर तथा गन्धमादन पवत की भूमिसे वह पूर्ण परिचित है। कुण्डिनपुर और उसके पास सें वहने वाली पयोष्णी ( पूणं ) नदी, विदमं देश का भोजकट प्रदेश, वरदा ( वर्धा ) नदी, भार्गव का आश्रम, मा्कण्डेय तथा जमदग्नि ऋषि का आश्रम, महावराह का मन्दिर, महावराह के शरीर से लिकली हुई पयोण्णी का समृद्ध वर्णन, ये सब बातें प्रमाणित करती हैं कि त्रिविक्रम भट्ट विदर्भ के रहने वाले थे । उत्तर की प्रसिद्ध चीजों की अपेक्षा अत्यन्त स्वल्प एवं अप्रप्तिद्ध दक्षिण की चीजों को बड़े आदर के साथ कवि स्मरण करता ३े। उसकी दृष्टि में श्री शेठ अपनी महिमा और रमणीयता से कछास पर्वत की शोभा का परिहास करता हेः विदर्भा नदी दक्षिण की सरस्वती हे) विदर्भा एक छोटी सी नदी दे किन्तु कवि का श्रद्धातिरेक उससे इस तरह की प्रशंसा करा रहा है। महावराह के जज्नों से प्रसुत पयोष्णी अपनी पविन्नता के लिये तीनो रोर्छो मे प्र्िदध्‌ गङ्गाका मी उपहास करती ह“ उत्तरपश्चिम और पूर्व के छोगों को सत्त खाने वाला तथा मटी.मांस के विना भोजन न करने बाल्य कहा हे । दाक्ञिणास्य रोगो में मांस भोजन का अभाव बताया गया है ।९ ০ १. देशो दक्षिणदिडमुखस्य तिलकः स्त्रीपुंसरत्नाकरः । न० च० प्र ० उ० ५४ इलो० . देखिये प्र० उ० इलो० ५४ और ५५ के समीपवर्ती गद्य । ३. अपहसितकेलासश्री: श्रीशैलः, न० च० पृ० ७४ वीरपुरुषं तदेतदू वरदातटनामक महाराष्ट्रम्‌ । दक्षिणसरस्वती सा वहति विदर्भा नदी यत्र॥ শখ সীল পাপ পপ সা ভাগ কক এ পক घ्‌ृ० उ० इलो० ६६ २. गज्भामुपहसन्ती '* *- पुण्यपया: पयोष्णी वहति । ६. अहो नु खल्वमी मत्स्यमांसविरहितमुदीच्यप्रतीच्यप्राच्यजनाः प्रियसक्तवों भोक्तमेव न जानन्ति | विरलः खु दाक्षिणात्येषु मांसाशनव्यवहारः । न० च० स० उ० इलो० ११ के आगे पवत भेदि पवित्रं जैत्रं नरकस्य बहुमतङ्खहनम्‌ । हरिमिव हरिमिव हरिमिव वहति पयः पद्यत पयोष्णी ॥ : घ० उ० इलो० २९ चक्रधरविषमाक्ष कृतमदकलराजहंससंचारम्‌ । , हरिहरविरञ्चिटशं भजत पयोष्णीतटं मुनयः ॥। प्र० उ० इलो० ३३




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