जैन योग का आलोचनात्मक अध्ययन | Jain Yog Ka Aalochanatmak Adhyayan

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Jain Yog Ka Aalochanatmak Adhyayan by अर्हददास वन्डोबा - Arhad Das Vandoba

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ब ) ७ प्राकृतिक चिकित्सा शोध कार्य < जैन साहित्य और शोध साहित्य का प्रकाशन ९, पुरातन साहित्य का पुन्ःप्रकाशन १० नारी शिल्प केन्द्र ११ चलता फिरता औौषधालय | भवन की रूपरेखा श्रो आत्मवल्ूूभ सस्कृत्ति मन्दिर के अन्तर्गत बनेनेवाले भवन आदि -की रूपरेखा सामान्यत इस प्रकारहै - ‡ , कलात्मकं प्रवेश द्वार से लगसग ३०० फीट अन्दर, ८४ फीट ऊँचा पुरातन जैन कछा के अनुरूप एक भव्य प्रासाद निर्मित होगा । भवन की शाण ( स्तम्भपीठ ) सड़क से १३! फीट ऊंची होगी। इसके बीच में ६ फीट दीर्घा से घिरय हुआ ६३ फीट व्यास का रंगसडप बनेगा। सीढियो पर झ्ुंगार चौकियाँ तथा ऊपर साभरण इसे सुशोमित करेंगे। पीछे स्थित शोध ब्लाक मे प्राकृतिक चिकित्सा पर शोध कार्य, शिवाविद्‌, प्रवन्धको तथा परयंटको के निवास का प्राविधानं है } समूचे भवनं क नीचे भूतलूघर ( बेसमेन्ट्‌ ) मे पुस्तकालय, विद्यापीठ, संग्रहालय त्तथा प्रकाशन विभाग होगा। प्रवेशद्वार से भवत् तक पहुँचने का. रास्ता फुलवारियों त्तथा फव्बारो से युक्त होगा । पक्के रास्ते के मध्य क्वचित्‌ छोटी-छोटी सीढियाँ होगो जिससे दर्शनार्थी सहज मे १३ फुट की चोकी तक पहुँच सकेगा | सावेजनिक सभाओ के लिए पीछे खुला प्रागण होगा। पर्यटकों के लिए जलपान गृह की भी व्यवस्था होगी । निर्माणाधीच स्मारक का नाम “आत्मवल्छस सल्कृति मन्दिर रखा गया है। स्मारक भवन के निर्माण मे पाच-सात्त वषं का समय अपेक्षित है! व्यय का लनुमान एकं करोड रहै, सम्भवं है परिस्थित्तिवन्न इसमे भी अधिक हो । आज तक पु० महत्तरा साध्वी श्री मृगावतीजी महाराज की ओजस्वी प्रेरणा से प५ छाख की धत्तराशि के वचन मिले हैं | प्रवन्धकों की अभिलापा है और प्रयास है कि जहाँ स्मारक भवन भारतीय भौर जेन स्यापत्य कला का मतीव सुन्दर भव्य और आकर्षक प्रतीक हो वहाँ साहित्यिक, अनुसंघान, अध्ययन, प्रक्राशव आदि प्रवृत्तियो का प्रमुख केन्द्र हो। हम चाहते हुँ कि देश विदेश के जिज्ञासु यहाँ से लाभान्वित हो और यह परम पावन स्मारक स्वाध्याय, योग, ध्यात और साधचा का प्रेरणा केन्द्र बने | “राजकुमार जेन, सन्नी




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