प्रबंध सागर | Prabandh Sagar

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कृष्णानंद पंत - Krishnanand Pant

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पंडित यज्ञदत्त शर्मा - Pandit Yagyadatt Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ में घिचारों की शुप्कता और दुरूदता, मी इतनी अधिक नहीं होनी दिप्‌ कि बह पाठको के हृदूय को अपनी शोर खीच टी न सके 7 1 हरीनीय जी टदधन एम० ए० नियन्ध के विपय में लिखते हैं -- 'नियघ लिखना अभ्यास से ही प्राता दै } निवघ लेखक के ज्ञान छी कसौटी हे । उथला या पादित्य-प्रदशन के भाव से जिखा गया अथवा उलसे हुए भाषों से योकिल निबघ व्यय होता दे। नियघ शब्द का धर्थ है वेंघा हुआ! | अत যী से, अत्यन्त चुने हुए शब्दों में किसी विषय पर अपने विचार प्रकट फरने के प्रयस्नकोष्ी निषध कष सकते हैं | निबंध के विषयों प्ही फोई सीसा मही दे। अ्राकाश-कुसुम से क्षेकर प्वींटी तक निवध का विषय हो सकता दै 1 “पियध के लिए यह आवश्यक दै कि पूरे निवध का रूप एक हो । प्रत्येक नियध के ध्यादि, मध्य ओर अन्त का विभाजन ठीकन्ठीक ्टोना, ध्याहिएु । नियध का शआरम्म ऐसे सुन्दर ढग से होना चाहिए कि उसे पढ़ते ही पदनेवालों फी उस्खुकता यदे झोर वद्द आपसे श्राप उसे पूरा पढ़ डालने के मोद फो सवरण न फर सके | इसके यअनिरिक्‍त सेखक को इस यातकाभी ध्यान रग्बना चादिए कि पाठक ज्यो-ज्यो उसके: निवध फो पढ़ता चत्ना जाय, लेस के भारम्म में द्वी उस ऐसी सामग्री मिल जाय, जिससे उसकी यह घारणा द्वोजाय कि उसे इस लेख में मौलिक ढग से ज्षिसी हुई कुड मनोरज॒क भौर विचार-पूर्ण बातें पढ़ने कौ मिलेगी | निवध का मध्य नियन्ध का सयमे श्रधिक विस्तृत भाग তা है । आदि से इसका सबध द्ोना चाहिए और इसके सभी समिद्दान्त वाक्य एक-एक करके निश्चित परिणाम फो ओर झुफे होने चाहए । नियय के मष में ली लेसकरू पाठफ को अपने ते सममाने का পরল কতো ঘট) नियघध के श्रंतिम अश के संबध में लेगक को यह ध्यान रायना चाहिए कि नियध प्यनायास न समाप्त हो जाय । यदि ऐसा हुआ छो पष्ट पायक को रचिफर नम होगा थोर टससीौ शोली को दूषित




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