राजस्थान में राजनैतिक जन-जागरण | Rajasthan Me Rajnaitik Jan Jagran
श्रेणी : राजनीति / Politics

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
133
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)८ राजस्थान में राजबैतिक जन-जागरणकारी जालिमर््हि के पुव माधो्िह के मध्य श्रच्छे सबधनदीये। शव
श्रवस्या में माधोसिह महाराव किशोरसिह को प्रपना स्वामी स्वीकार करने के
लिए तैयार नहीं बे। ६ और ७ श्रप्रेल १८१६ को महाराजा किशोर सिंह के
सम्थेको ने सेना को बुला लिया, उघर राजराणा माघोतिह ने भी प्रपने
समर्थक संटिकों को भामत्रित कर लिया। इस प्रकार एक सर्प को स्थिति
उत्न्न हों गई जिसने ब्रिटेन के हस्तक्षेप को आमत्रित किया। कर्तल टॉड ने
एक १२ यृत्रीय समझौता तैयार किया जिसे रावराजा भर राजराणा दोनों ने
ही स्वीकार कर लिया। इस सममभौते के अनुसार राजराणा को २८० सैतिक
নিগুলি কন কা আনিকার হিজর ব্য गरतु राजराजा ने कुछ शौर श्विक
सैनिक वुलाकर स्थिति को शोर भ्रधिक गम्भीर बना दिया। कर्नेल टॉड के
द्वारा रावराजां को भ्रतिम चेतावनी (प्रल्टीमेटम) दे दी गई कि वह पाच दित
अ्रदर भ्रदर उनक समभौत को स्वीकार करते श्रम्यया उसके मयकर परिणामं
होगे । महारावं ममते को स्वीकार करने के लिए तैयार नही थे, प्रनत२८ दिसम्बर को भद्दाराजा ने कोटा से बू दी की और प्रस्थात किया! कर्तस
टॉड ने महाराणा को चेतावनी दी कि उनका सशस्त्र सामता किया जाएगा!জর नगरौल के पास महाराव की सेना और राजराणा व ब्रिटिश समर्थित
सेना के मध्य सधर्प हुआ । महाराव वे छोटे भाई विशोरतिह बुरी तरह घायल
हुए भौर महाराव को जयपुर सीमा मे शरण लैने के लिए बाध्य होना पडा ।ब्रिटेन के इस भ्राचरण ने भन््य राजपूत राजाग्रो को सशकित बता दिया । वे
सोचने लगे कि भ्राज जो कुछ कोटा महाराव के साथ हुप्ना है वही वल्ल उनके
साथ भी हो सकता है । ऐसी ग्वस्था मे ब्रिटेन के प्रति उनके हृष्टिकोरा में
परिवर्तन प्रारम्भ हुआ । इसी बीच १२ तवम्बर को कोटा महाराव नाथद्वारा
पहुंचे । क्नेंड टॉड के वक्रील से एक समभौता-अस्ताव रखा जिम पर
१८ नवम्बेर १८२१ कौ महाराव ने हस्ताक्षर कर दिए । एक प्रकार से यह
ब्िटेन की सत्ता के समक्ष कोटा महाराव का पूर्ण समर्पण था। कोटा के भ्रात-
रिक मामलो मे ब्रिटिश हस्तक्षेप ने एक बार पुष यहू सिद्ध कर दिया कि ब्रिटेत
का एकमात्र उद्देश्य है राजस्थान मं ग्रपने साम्राज्यवाद को पूरी तरह
मजबूत वना देना । साथ ही साथ यह् देशीय राजाघ्रोकी भ्रार्खें खोल देने गेलिए पर्याप्तं या । स्प मे, देशीय राज्यो कौ जनता का त्रिटेन की ग्यायप्रियता
में से विश्वास हिल उठा शौर उनमे भी ब्रिटिश विरोधी भावनाएं जन्म लेने
लगी ।
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