श्रीसनातन धर्मलोक [भाग १] [चतुर्थ पुष्प] | Shri Sanatan Dharmaloka [Bhag 1] [Chaturtha Pushp]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[হ] « (२) श्वीरारदापीटाधीश्वर अने श्रीकरपाश्नीजी, महाराज थ्रादि आधार्यों भरने मदात्माओं द्वारा मुक्तकंडथी प्रशंसित थ्रा एकल पन्थना अवल्लोकनथी धर्म-बाबतमी समस्त शंकाश्रोनु समाधान यह जगे। एना-कर्ता हुप्रत्तिद्ध विद्वान्‌ पं० दीनानाय शास्त्री सारखत छे। वेश-* विभाजनथ्या ते थो मुलतान बादवा समातम-घ्म संस्कृत-कालेजना अ्रध्यक्ष दृता। विभाजनथ्या बाद देहलीना हिन्दी संस्छृत-कालेसना अध्यक्ष यया थे। ते और श्रीदयानन्दजी मत-खए्डन करवागां घणात्त -होग्रियार विद्वान छे | तेश्रोषए महान्‌ अन्यद) ग्न्यमालां रूपमां श्रा महाग्रन्थ-प्रकाश -शरू यदे गया चे । श्रा पृ्तके धुन उपादेय ह्ये कायी। दरः व्यि तथा पुत्तकालयो, शिवालयों माटे संगा ठे । | --श्रीमह्ाबलभद्ट वैदान्तशिरीमणि, सम्पादक “नवमारती! (जरतो) राजकोट । सौरा) (६।९।९४) । 4 (३) परम पुज्यपाद, मारतकी महान्‌ विभूति श्री प° दीनानाधजी शास्त्री सनातनधर्मी जगतके माने हुए अद्भुत रत्न देँ। “मैं निःसंकोच कह सकता हैँ कि--यह ३० करोड़ हिन्दुओं पर भ्गवानकी असीम कृपा है कि जो झाप-जैसा श्रमूलपूर्व, महान्‌ धुरन्धर-विद्वान्‌ प्राप्त हुआ है। ''थापके खोजपूर, शास्त्रीय लेखोंको पाकर नास्तिकोंकी बोलती, बन्द हो जाती है, भऔौर काशी तकके बड़े-बड़े विद्वान्‌ तक आपकी प्रशंसा करते नहीं अ्रघाते नौर श्रापकी धाक माने हैं ।**'हमारी प्रत्येक सनातनपर्मामात्रसे प्रार्थना है कि वह शास्त्रीजी महाराजके ঘন্থাজী आप्य ही पू रीर तन, मन, धने सहायता कर महान्‌ परय भागी वने। ५ * “भक्त रामशरणदास, पिलखुश्ा, ७-६-१३ मै




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