साहित्य - समालोचन | Sahitya Samalochan

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Sahitya Samalochan by सत्यप्रकाश - Satyaprakash

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ই ) तभी तो बाबू गुलाबराय ने लिखा है कि 'एक अच्छा कलाकार अपने युग का मुख और मस्तिष्क होता है। मस्तिष्क में जो विचार उठते हैं, वही मुख बोल देता है। युग में जो प्रावाज उठती है, उसी को साहित्यकार प्रतिध्वनित करता है।' साहित्यकार समाज का प्रतिनिधि ही नहीं होता, श्रपितु सरष्टा भी होता है ) वह समाज की मान्यताओं को ज्यों का त्यों नहीं श्रपनाता, अपितु उनकी समालोचना कर समाज के लिए एक आादर्श भी प्रस्तुत करता है। इस दृष्टि से साहित्यकारों को तीन श्रेणियों में विभवत किया जा सकता है। पहले वर्ग में उन साहित्यकारों को रखा जा सकता है जो समाज की मान्यताओं को ज्यों का त्यों ग्रहण कर लेते हैं और उसी रूप में उनका चित्रण कर उन पर भ्रपनी स्वीकृति की मोहर लगा देते हैं। दूसरे वर्ग में वे साहित्यकार आते हैं. जो समाज की त्रुटियों को देखते हैं, किन्तु उनको नष्ट करने की बात कहकर उनमें सुधार का सुझाव देते हैं। इस प्रकार वे मध्य' मार्ग को श्रपताकर चलना चाहते हैं। तीसरे वर्ग में उन साहित्यकारों का नाम आता है जो समाज की मान्यताग्रों को ठोक-पीटकर परखते हैं, उसकी त्रुटियों की कट्ठु आलोचना करते हैं और उन च्रुटियों को नष्टकर नये समाज का निर्माण करना चाहते हैं । कवीर श्रादि सन्त कवि तथा ग्राधुनिक युग के प्रगतिवादी कवि इसी श्रेणी में आते हैं। प्रेमचन्द का कुकाव भी कुछ इसी ओर था । महान्‌ साहित्यकार समाज का ज्यों का त्यों चित्रण करके कभी सस्तुष्ट नहीं हो सकता । कभी-कभी वह केवल ब्रूटियों का चित्रण करके इसलिए रह जाता है कि पाठक उस पर स्वयं विचार कर सके । जिस प्रकार दर्पण में अ्रपने मुख की कमी को देखकर हमें उसे दूर करने की प्रेरणा मिलती है, उसी प्रकार साहित्य में अ्रपती कमजोरियों का चित्रण देखकर समाज को उन्हें दूर कर भागे बढ़ने का बल मिलता है। प्रावश्यकता पड़ने पर साहित्यकार स्वयं भी इसके लिए प्रेरणा देता है । तुलसी का सारा सटित्य समन्वयात्मक दृष्टिकोण से भरा पड़ादै, जो तत्कुलीन समाज को एकता का संदेश देता है । साहित्य समाज के केवल वतमान रूप तकं ही सीमित नहीं रहता, भ्रपितु




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